प्रभात रंजन
कथाकार
‘गांव वह होता है, जिसे छोड़ कर पापा दिल्ली आ गये’. मेरी बेटी ने बताया कि हिंदी की परीक्षा में गांव पर निबंध लिखने के लिए आया था, तो उसने यह लिखा. मेरा मन अपने गांव लौट गया. फागुन का महीना है, इस महीने में गांव की याद ज्यादा आती है. सिर्फ इसलिए नहीं कि मेरी बेटी ने अपने निबंध में यह वाक्य लिखा, बल्कि इसलिए भी कि इस महीने की मस्ती, उल्लास के लिए हम साल भर इंतजार किया करते थे. इसीलिए बार-बार मन उधर लौट जाता है. खेतों में गेहूं की पकी बालियों के मौसम की ओर. आम और लीची के पेड़ों पर आते नये मंजर की ओर. पिता जी ने अभी हाल में ही फोन पर बताया कि इस साल आम में मंजर बहुत आये हैं, लेकिन खानेवाला ही कोई नहीं है.
फिर से वे मंजर में ही आम के बगीचों को बेच रहे हैं. इस बार व्यापारी पहले से अच्छी कीमत दे रहा है. पता नहीं उनकी आवाज में आम बेचने से होनेवाली कमाई की खुशी होती है या इस बात की हूक होती है कि भरे-पूरे परिवार के बावजूद उनके घर में मौसम में कोई आम खाने नहीं आता है.
अजब सा मौसम है हवा के साथ पत्ते टूट-टूट कर गिरते रहते हैं, सड़कों पर धूल नहीं पत्ते उड़ते रहते हैं. कल रात पत्तों की सरसराहट सुनाई देती रही और मन में कहीं केदारनाथ सिंह की कविता की पंक्तियां गूंजती रही- ‘झरने लगे नीम के पत्ते/ बढ़ने लगी उदासी मन की…’ सोचता रहा कि नीम के पत्ते ही क्यों लिखा होगा उन्होंने? शायद इसलिए कि इस मौसम में मन की सारी कड़वाहट दूर हो जाती है. भौतिक विस्थापन से मन का विस्थापन थोड़े हो जाता है.
तभी तो फागुन में गांव बहुत याद आता है. सुबह की भीनी हवा में रात भर टपके महुआ चुनने जाना, अमलतास के पेड़ों को हसरत से देखना, उसके पीले फूलों में इस मौसम का खास रंग होता है न. शाम होते ही दूर बस्तियों से आती डम्फ की थाप, झाल की गूंज के साथ आती आवाज- जोगीरा सा-रा-रा-रा.
हमारे मिथिला के गांवों में होली एक दिन का त्यौहार नहीं होता है, वह तो महीने भर की मस्ती के उत्सव की तरह मनाया जाता है. दिन की धूप के संग मन पर छाती उदासी, अजब सा अनमनापन, आगामी फसली मौसम की फसलों की तैयारी में दूर-दूर तक दिखता खाली खेतों का विस्तार मन को खाली कर जाता है शाम को उल्लास के रंग-ढंग से भरने के लिए. जाने किसने लिखा था फागुन मन की अवस्था का नाम भी होता है.
मन फागुन की बयार के संग डोल रहा है, तो कारण यह है कि विस्थापन के कारण हम मौसमों को जीना भूलते जा रहे हैं. हम भूलते जा रहे हैं कि फागुन मस्ती-उल्लास के साथ यह संदेश भी दे जाता है कि समाज में मेल-मिलाप के साथ रहने का क्या रंग होता है? कम-से-कम एक महीने ऊंच-नीच, बड़े-छोटे का भेद धुंधला जाता है.
न गर्मी न सर्दी, इस मौसम का यही ढंग तो जीवन पर चढ़ता है कि समरस रहना चाहिए, समभाव से रहना चाहिए. फागुन जनतंत्र का उत्सव मनाने का असली मौसम है. फागुन से याद आया कि हम गांव में हर मौसम को पत्तों के बदलते रंगों, आसमान में बादलों के ढंगों से, चिड़िया की आवाजों से पहचानते थे. इधर लिख रहा हूं उधर कोयल और पपीहे की आवाज एक साथ आ रही है. सुबह-सुबह बेटी के लिखे एक वाक्य ने गांव के मौसम में पहुंचा दिया. नासिर काजमी की पंक्ति याद आ रही है- रुत आयी पीले फूलों की/ तुम याद आये, तुम याद आये…
