संविधान ने अनुच्छेद-19 के तहत अभिव्यक्ति की आजादी दी है, लेकिन इसकी सीमा पार करने की नहीं. देश के हर नागरिक के लिए राष्ट्रवाद एक भावनात्मक पहलू है. देश के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों पर हमारा गुस्सा फूटना लाजिमी है.
जेएनयू की घटना निंदनीय है, लेकिन जिस तरह से देश का विरोध करना नैतिक रूप से गलत है, उसी तरह विरोध को देशद्रोह समझना कानूनी रूप से गलत है़ इस मामले में सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए, क्योंकि इससे देश में माहौल खराब होता है और अतिरंजित राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलता है, जिससे लोकतंत्र की छवि खराब होती है. अत: सरकार इस असहमति को मान दे और इसकी वजहें तलाशकर उन्हें दूर करे़
सुमित कुमार बड़ाईक, ई-मेल से
