डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
पता नहीं, अपने पर अनास्था और अविश्वास के किन क्षणों में आदमी को यह महसूस हुआ कि उसे एक अदद देवता की भी जरूरत है. कब, क्यों और किससे उसने कहा कि इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा. कब और क्यों उसने अपनी ही बनायी शै को अपने पर हावी होने दिया, इतना कि उसे खुद भी लगने लगा कि उसने उस शै को नहीं बनाया, बल्कि उस शै ने ही उसे बनाया है. फिर क्यों वह उसी को सत्य समझने लगा और अपने समेत पूरे जगत को असत्य.
फिर तो देखादेखी हर बंदे द्वारा अपना अलग देवता बनाना और उसे दूसरे के देवता से बड़ा बताना भी अनिवार्य हो गया. यहां तक घोषित करना पड़ा उसे कि तुम चाहे किसी भी देवता की पूजा कर लो, घूम-फिर कर वह हमारे ही देवता के पास आ जाती है.
अपने देवता से भी आह्वान करवा दिया उसने कि भला चाहते हो, तो मेरी शरण में आ जाओ.
स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय देश में 33 करोड़ देवी-देवता थे और जनसंख्या भी उस समय देश की उतनी थी. उसके बाद जनगणना तो होती रही, लेकिन देवगणना रुक गयी. फिलहाल कहना मुश्किल है कि कितने करोड़ देवी-देवता यहां हो गये या रह गये हैं.
कबीर जैसे संत-महात्मा कहते रह गये कि मोको कहां ढूंढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास रे, ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में… आदि, लेकिन हम नहीं माने. उद्दालक जैसे ऋषि-मुनियों ने भी लाख समझाया कि वह कोई और नहीं, तुम्हीं हो- तत्त्वमसि श्वेतकेतु, लेकिन हमने अपने कान पर जरा भी जूं नहीं रेंगने दी. भगवान बुद्ध ने मूर्तिपूजा का विरोध किया, लेकिन हमने बुद्ध की ही इतनी मूर्तियां बना डालीं कि बुद्ध शब्द ही घिस-घिस कर फारसी में बुत हो गया.
आदमी ने देवता को बनाया, तो स्वभावतः उसे अपने जैसी ही शक्ल-सूरत दी. कहा जा सकता है कि आदमी ही अपने को देवताओं के रूप में अभिव्यक्त करता है, भले ही कहा यह जाता हो कि देवता अपने को आदमियों के रूप में अभिव्यक्त करता है- एकोsहं बहुष्यामि. भले ही इससे यह प्रश्न क्यों न उठ खड़ा हो कि आदमी की बनायी हुई चीज क्या खुद उससे बड़ी हो सकती है?
और यह भी कि क्या आदमी जैसा ईश्वर पशु-पक्षी और पेड़-पौधे आदि प्रकृति के अन्य उपादानों को मंजूर होगा, जो उन्हें नष्ट करने पर तुला है?
अगर जो कहा जा सकता है, वह सच हो, बजाय उसके जो कि कहा जाता है, तो फिर यह भी उतनी ही शिद्दत से कहा जा सकता है कि आदमी के भीतर एक डकैत बसता है. वह डकैत खुद को महिमामंडित करवाने के लिए हमसे कहानियां लिखवाता है, फिल्में बनवाता है, और अब तो अपनी पूजा करवाने के लिए अपने मंदिर भी बनवाने लगा है.पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में दुर्दांत डकैत ददुआ के मंदिर की स्थापना से तो यही लगता है.
1992 में यह दस्यु-सरगना अपने 72 साथियों के साथ पुलिस की घेरेबंदी में गन्ने के खेतों में फंस गया था. अपने को बुरी तरह से घिरा पा ददुआ ने संकल्प लिया कि यदि मैं बच जाता हूं, तो पंचमुखी हनुमान मंदिर की स्थापना करूंगा. वह बच गया, तो कालांतर में उसने उसी स्थान पर हनुमान जी के मंदिर की स्थापना कर दी. हनुमान जी की कृपा का यह नतीजा हुआ कि आज उनकी बगल में उनका डाकू-भक्त भी सपत्नीक विराजमान है.
ददुआ को हनुमान जी ने अपनाया, उनके बेटे को समाजवादी पार्टी ने. अपराधियों और उनके परिवारों का पुनर्वास सरकार से भी ज्यादा राजनीतिक पार्टियां करती हैं और उनमें भी समाजवादी पार्टी सबसे आगे है. देश में समाजवाद लाने का यह उसका नायाब तरीका है.
