प्राय: 26 जनवरी और 15 अगस्त को राष्ट्रध्वज के प्रति हमारी दीवानगी चरम पर होती है़ लेकिन इस बीच तिरंगे की वास्तविकता लुप्त हो रही है. हमारे राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंग व्यापक अर्थ समेटे हैं.
लेकिन जब आप केसरिया की जगह कत्थई-लाल, हरा की जगह तोते के पंख-सा हरा देखेंगे तो क्या अर्थ का अनर्थ नहीं होगा? गनीमत है कि सफेद का कोई विकल्प नहीं, वरना वह भी बदल जाता. अशोक चक्र पर अधिक स्याही छोड़ने से उसकी तिल्लियां 24 की जगह 124 हो गयी हैं. राष्ट्रध्वज के आकार का अनुपात भी 2:3 से बदलकर इसे वर्गाकार कर दिया गया है़ क्या इसे देखनेवाला कोई नहीं है?
मनोहर पांडेय, धुर्वा, रांची
