लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद का यूं तो हरेक सत्र महत्वपूर्ण होता है, पर बजट सत्र की अपनी कुछ खास अहमियत है. इस सत्र में पेश होनेवाले रेल और आम बजट से जनता की बड़ी उम्मीदें जुड़ी होती हैं.
उसे इंतजार होता है कि सरकार इसमें ऐसी नीतियों और कार्यक्रमों की घोषणा करेगी, जो उनकी तकलीफों का हल बन सके. साथ ही विपक्ष सार्थक बहस में भाग लेकर उन नीतियों और कार्यक्रमों की खामियां सामने लायेगा. इस लिहाज से बजट सत्र का सुचारु संचालन देशहित में जरूरी माना जायेगा. सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में और सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने बयान में भी इसी जरूरत पर जोर दिया. राष्ट्रपति ने सही ही कहा कि संसद चर्चा के लिए है, हंगामे के लिए नहीं. सरकार सदन को चलाना चाहती है, विपक्ष को उसमें सहयोग करना चाहिए.
प्रधानमंत्री ने भी कहा कि आज भारत की दुनिया में जो स्थिति बनी है, उससे पूरी दुनिया का ध्यान हमारे बजट सत्र पर है. साथ ही उम्मीद जतायी कि संसद के समय का सदुपयोग होगा, सार्थक चर्चा होगी और देश के सामान्य नागरिकों की आशाओं पर गहन चिंतन होगा. लेकिन, गौर करें तो इन दोनों बयानों का इशारा इस बात की ओर है कि संसद में हंगामे के लिए विपक्ष जिम्मेवार है. अब विपक्ष को चाहिए कि इस आरोप को गलत साबित करे.
हालांकि, ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर सरकार से जवाब-तलब की महती जिम्मेवारी भी विपक्ष को निभानी है. इसलिए यह सत्ता पक्ष की प्रारंभिक जिम्मेवारी है कि वह विपक्ष के साथ जरूरी तालमेल बनाये रखे. प्रधानमंत्री के बयान के बाद उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार अपनी इस जिम्मेवारी का गंभीरता से निर्वहन करेगी.
दुर्भाग्य से, पिछले सत्रों की तरह यदि इस सत्र में भी हंगामे का ही दोहराव दिखा, तो संकेत यही जायेगा कि हमारे सांसद इतिहास में हासिल अनुभवों से सबक सीखने के लिए तैयार नहीं हैं. हंगामे से न सिर्फ देश का धन बरबाद होता है, बल्कि इससे देश की प्रगति और छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ता है. फिलहाल देश अपनी संसद और सांसदों की ओर बड़ी उम्मीद से देख रहा है.
