जन्म लेने के बाद से ही मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे मातृभाषा कहते हैं. मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषायी पहचान होती है़ रवींद्र नाथ ठाकुर ने कहा था, ‘मातृभाषा मातृदुग्ध के समान है’. इसी उक्ति से मातृभाषा की महत्ता को समझा जा सकता है. मातृभाषा से ही मनुष्य अपने निश्छल भावों और आतंरिक अनुभूतियों को सहजता से अभिव्यक्त कर सकता है़
आज संवेदनहीनता के कई रूप देखे जा रहे हैं और इसकी एक मुख्य वजह है प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में न होना. मातृभाषा ही सबसे पहले इनसान को सोचने-समझने और व्यवहार की अनौपचारिक शिक्षा और समझ देती है. आशा है केंद्र और राज्य सरकारें मातृभाषाओं को जीवित रखने को कारगर कदम उठायेंगी़
मनोज कु पाठक, आदित्यपुर, जमशेदपुर
