हमारे समाज में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का उदय एक ऐसी घटना है जिसने मनुष्य की जीवन शैली, और अनुभव से परखे मूल्यों को झकझोर कर रख दिया है. नवजात शिशु के भरपूर पोषण के लिए प्रकृतिप्रदत्त मां के स्तनपान की चिरकाल से चली आयी परंपरा के स्थान पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बेबी फूड स्थापित करवा देना इसका एक उदाहरण मात्र है. राज्य, राष्ट्रीयता, धर्म, ईमान- इन सब से ऊपर उठ कर मुनाफे और आर्थिक साम्राज्य की हवस ने इन कंपनियों को सुपरस्टेट बना दिया है जो प्रकृति और मनुष्य दोनों के शोषण पर टिकी हैं. जीवन के हर क्षेत्र में, रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान से लेकर युद्ध के विकराल हथियार बनाने तक इनकी घुसपैठ है.
औद्योगिक क्रांति के बहाने पश्चिमी देशों द्वारा उपनिवेशीकरण ने इन देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तीसरी दुनिया के देशों में अपना व्यापार जाल फैलाने का पूरा अवसर दिया. इन्होंने लातिनी अमेरिका और एशियाई देशों से सस्ता कच्चा माल बटोरा और अपने महंगे तैयार माल से उनके बाजारों को पाट दिया. नतीजतन इन देशों की टिकाऊ अर्थव्यस्था टूट गयी और संपन्न देश अविकसित देशों की श्रेणी में चले गये. द्वितीय महायुद्ध के बाद उपनिवेशीकरण का जाल टूटा, पर विकास के नाम पर ये कंपनियां तीसरी दुनिया में अपनी घुसपैठ बना रही हैं.
इन कंपनियों ने तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक स्वायत्तता नष्ट कर दी है तथा व्यापक पैमाने पर गैर- बराबरी और उपभोक्तावादी अपसंस्कृति फैलायी है. अब तो विकसित देश भी इनके कारण बेरोजगारी और उसके फलत: बढ़ते तनाव के शिकार हो रहे हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में मानव सभ्यता-संस्कृति के लिए खतरे की घंटी है. प्रीतीश दास, रांची
