एक उलझी बहस, एक परिपाटी, विकास के लिए तमाम नयी योजनाएं और हितैषी होने की खुद पर जिम्मेवारी एवं अपनत्व का चोला पहने समाज के मुट्ठीभर ठेकेदारों से हकीकत का सामना करता समाज का एक अंग आज भी अपनी दुर्दशा देखने के लिए मजबूर है. जिसे संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक के नाम से जाना जाता है. इसमें मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और कुछ पहाड़ी जातियां आती हैं. पर इनके बीच सबसे अधिक कुल जनसंख्या का 13 प्रतिशत हिस्सा मुसलिम समुदाय के साथ अल्पसंख्यक हितैषी होने का सबसे अधिक ढोंग रचा जाता है.
यही वह धर्म है जिसके साथ जुड़ने पर धर्मनिरपेक्ष की छवि मिलती है. यह वही धर्म है जिससे जुड़ने से सत्ता के द्वार में प्रवेश मिलता है. जिनके कल्याण के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक नित नयी योजनाओं की रूपरेखा तैयार करती रहती हैं. कहने के लिए तो अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए सूबे में अनेक योजनाएं संचालित हैं, पर जब उनकी जमीनी हकीकत का जायजा लिया जाता है तो परिणाम यह होता है कि अल्पसंख्यक समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आज भी विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाया है.
समझ में नहीं आता कि इनमें आखिर ऐसा क्या है जो सभी दल इनके आकर्षण में बंधे हैं. तभी तो सियासी दल राजनीति की रोटी से आश्वासन के पर्दे तले अल्पसंख्यक हितैषी होने का नाटक खेलते हैं. पुरानी योजनाओं की लीपा-पोती और नयी योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने की कवायद भी होती है. तभी तो सूबे की हेमंत सोरेन सरकार ने भी हालिया स्थापना दिवस पखवाड़े पर अल्पसंख्यकों का बुर्का पहन उनके अपने होने का राग आलापा गया, लेकिन उनके उत्थान की किसी नयी योजना पर चर्चा नहीं हुई.
नवनीत कु सिंह, रांची
