राजद के प्रदेश सचिव उमाशंकर यादव के पुत्र उपेश की हत्या के बाद जिस तरीके से उसके शव को लाया गया, वह वीभत्स है. चतरा के कुंदा में अपराधियों ने उपेश की हत्या की. घटनास्थल से शव को कुंदा लाने के लिए बांस का प्रयोग किया गया.
उपेश के शव का हाथ-पैर बांध दिया गया. फिर बांस में टांग कर लाया गया. यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ. पुलिस ने अपराधियों से ही शव ढुलवाया. इस घटना से यह पता चलता है कि पुलिस कितनी अमानवीय हो गयी है. शव के साथ सम्मानजक व्यवहार करने की परंपरा रही है. यह कोई पहली घटना नहीं है. कुछ साल पहले सीमा सुरक्षा बल के जवानों की बांग्लादेश के सैनिकों ने हत्या कर दी थी.
एक भारतीय जवान के शव को इसी तरीके से बांस पर लटका कर लाया गया था, जिसका विरोध हुआ था, आलोचना हुई थी. पश्चिम बंगाल में माओवादियों के शव जब इसी प्रकार लाये गये थे, तो इसकी भी आलोचना हुई थी. जब पुलिस को पता चल गया कि शव कहां पड़ा हुआ है तो यह दायित्व पुलिस का है कि वह शव को ढंग से लाये. हो सकता है कि वह जगह इतनी दुर्गम हो जहां पुलिस की गाड़ी नहीं जा सकती हो, लेकिन इसके भी उपाय हैं. शव को सम्मानजनक तरीके से खाट पर रख कर भी लाया जा सकता था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया. मृतक राजद के एक बड़े नेता का पुत्र था. पुलिस को यह जानकारी थी. इसलिए अगर पुलिस शव को ढंग से लाने में अक्षम थी तो परिवार का सहारा लिया जा सकता था.
ऐसी घटनाओं से पुलिस की छवि खराब होती है. यह बताता है कि पुलिस के प्रशिक्षण में कहीं न कहीं कमी है. मानवीय पक्ष से पुलिस को कोई लेना-देना नहीं होता. यह मामला सामने आता भी नहीं, अगर अखबार में तसवीर नहीं छपती. शवों के साथ इस तरह का बरताव मानवाधिकार का भी उल्लंघन है. इसलिए पुलिस के अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि ऐसी घटनाओं को दुहराया नहीं जाये. यह संवेदनशील मामला है. इससे भावना आहत होती है. एक तो पुलिस लोगों को सुरक्षा नहीं दे पाती, हत्या हो जाती है, और जब शव बरामद होता है तो उसके साथ भी असम्मानजनक व्यवहार होता है. बेहतर होगा कि पुलिस अपनी खामियों को तलाशे और दोषियों को दंडित करे.
