।। राजीव रंजन झा।।
(संपादक,शेयर मंथन)
भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बीते कुछ दिनों में कई अच्छी खबरें मिली हैं. इनमें सबसे अहम खबर यह है कि कारोबारी साल 2013-14 यानी अप्रैल, 2013 से मार्च, 2014 तक के 12 महीनों में से दूसरी तिमाही, यानी जुलाई-सितंबर, 2013 के दौरान आर्थिक विकास दर 4.8 प्रतिशत रही. पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून, 2013 के आंकड़े जब आये थे, तब विकास दर 4.4 प्रतिशत बतायी गयी थी. अभी ताजा आंकड़ों में उसे भी संशोधित कर 4.6 प्रतिशत कर दिया गया है. इस तरह जहां पहली तिमाही के पुराने अनुमान को सुधारा गया, वहीं दूसरी तिमाही के आंकड़े पहली तिमाही के सुधरे हुए आंकड़े से भी कुछ ऊपर के रहे. अर्थशास्त्रियों और बाजार विश्लेषकों ने इस पर खुशी मनायी कि चलो अब इन आंकड़ों ने फिर से ऊपर का रुझान पकड़ा तो सही. अब तक तो इनमें लगातार गिरावट की ही खबरें मिलती रही थीं.
अर्थव्यवस्था में सुधार का अगला संकेत मिला है उत्पादन (मैन्यूफैक्चरिंग) क्षेत्र के पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआइ में सुधार से. यह सर्वेक्षण एचएसबीसी की ओर से किया जाता है. इस साल जुलाई के बाद पहली बार नवंबर में इसमें सुधार देखा गया है. नवंबर में मैन्यूफैक्चरिंग पीएमआइ सूचकांक अक्तूबर, 2013 के 49.6 से बढ़ कर नवंबर, 2013 में 51.3 हो गया. एचएसबीसी का कहना है कि उत्पादन गतिविधियां नवंबर में बढ़ीं, क्योंकि घरेलू बाजार में कंपनियों को ज्यादा आदेश मिले, जिसके कारण उत्पादन ज्यादा हुआ.
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों और केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम को खुश करनेवाली खास खबर आयी चालू खाते के घाटे (करेंट एकाउंट डेफिसिट यानी सीएडी) को लेकर. जुलाई-सितंबर, 2013 की तिमाही में चालू खाता घाटा देश की जीडीपी के केवल 1.2 प्रतिशत के बराबर रहा. चालू खाते का घाटा दरअसल किसी अवधि में देश में आनेवाली और देश से बाहर जानेवाली विदेशी मुद्रा का अंतर है. इसे ऐसे समङों कि जितने डॉलर देश से बाहर गये, उसकी तुलना में कम डॉलर बाहर से आये, तो देश के चालू खाते में उस कमी के बराबर घाटा दर्ज हो गया.
जुलाई-अगस्त के दौरान चालू खाते का घाटा बेकाबू होने के डर से ही अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया बेहद कमजोर होने लगा था. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने एक तरह से चेतावनी दे डाली थी कि अगर सीएडी काबू में नहीं आया, तो भारत की रेटिंग घटायी जा सकती है. इस चेतावनी के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआइआइ) ने शेयर बाजार में बिकवाली शुरू कर दी, जिससे बाजार के प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी तेजी से फिसलने लगे थे.
अब जाहिर है कि जुलाई-सितंबर की तिमाही में सीएडी केवल 1.2 प्रतिशत रहना भारत सरकार के लिए बड़ी राहत है. एक तरफ तो इस अवधि में निर्यात कुछ सुधरा है, वहीं दूसरी ओर आयात में कमी आयी है, जिसका सीधा कारण सोने के आयात में भारी गिरावट है. सरकार ने सोने के आयात को हतोत्साहित करनेवाले जो कदम उठाये, उनका असर दिख रहा है और चिदंबरम अपनी इस सफलता पर खुश हो सकते हैं. जानकार कयास लगा रहे हैं कि अब कारोबारी साल 2013-14 में सीएडी 3 प्रतिशत रह सकता है, जो 2012-13 में 4.8 प्रतिशत था.
इन सब अच्छी खबरों के बीच एक मोटी बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत अब भी अच्छी नहीं हुई है. अभी तो बस बीमार के चेहरे पर जरा सी मुस्कराहट दिखी है. अगर जीडीपी में सुधार पर ही बारीक नजर डालें, तो इसमें हल्की वृद्धि का मुख्य कारण कृषि क्षेत्र में दर्ज की गयी वृद्धि है. खरीफ की अच्छी फसल के चलते कृषि और संबंधित क्षेत्रों की विकास दर दूसरी तिमाही में 4.6 प्रतिशत रही, जो नौ तिमाहियों में इसकी सबसे तेज वृद्धि है. मगर कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का सबसे अनिश्चित क्षेत्र है. दूसरी तिमाही में इसका आंकड़ा बेहतर होने का यह मतलब कतई नहीं है कि आनेवाली तिमाहियों में भी इसके अच्छे प्रदर्शन का भरोसा किया जा सकता है.
दूसरी ओर न तो उद्योग जगत और न ही सेवा क्षेत्र के प्रदर्शन को संतोषजनक माना जा सकता है. उत्पादन क्षेत्र की वृद्धि दर केवल एक प्रतिशत रही है. इसे हम भले ही पहली तिमाही में दर्ज 1.2 प्रतिशत की गिरावट की तुलना में सुधार के तौर पर देखें, लेकिन एक प्रतिशत वृद्धि दर को बेहद कमजोर कहा जा सकता है. फिक्की ने जीडीपी के ताजा आंकड़ों पर कहा कि उत्पादन क्षेत्र के आंकड़ों में हाल में काफी उतार-चढ़ाव रहा है और यह अब भी अपने सबसे बुरे दौर से उबरा नहीं है.
सेवा क्षेत्र अब भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा है और इस क्षेत्र में लगातार धीमापन आना एक बड़ी चिंता है. दूसरी तिमाही में सेवा क्षेत्र केवल 5.9 प्रतिशत वृद्धि दर्ज कर सका. पहली तिमाही में इसकी वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत थी. अगर पिछले कारोबारी साल की दूसरी तिमाही को देखें, तो उस समय इसने 7.6 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की थी. सेवा क्षेत्र में आ रहे धीमेपन से साफ है कि अर्थव्यवस्था में खपतवाली मांग घटती जा रही है. दूसरी ओर निवेश संबंधी मांग की हालत का अंदाजा बैंकिंग क्षेत्र में कर्ज की मांग से लगाया जा सकता है. बैंकिंग क्षेत्र के लिए वैसे तो यह व्यस्त मौसम (बिजी सीजन) कहा जाता है, मगर इस क्षेत्र से आती खबरें बता रही हैं कि मांग बड़ी सुस्त चल रही है. भारतीय स्टेट बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से आयी एक खबर में बताया गया कि अर्थव्यवस्था की विकास दर कमजोर होने के चलते कर्ज की मांग भी कम चल रही है. हाल में कैबिनेट कमिटी ऑन इन्वेस्टमेंट्स ने बहुत-सी परियोजनाओं को स्वीकृति जरूर दी है, लेकिन उनके लिए कर्ज की मांग आने में अभी कुछ समय लगेगा.
वैसे तो बैंक अधिकारी बताते हैं कि कर्ज की मांग घटने के लिए मुख्य रूप से आर्थिक विकास दर में गिरावट ही जिम्मेवार है. अधिकारी ऊंची ब्याज दरों के चलते कर्ज की मांग घटने से इनकार करते हैं, लेकिन हकीकत यही है कि कम विकास दर के बीच ऊंची ब्याज दरें करेले पर नीम चढ़े की तरह हैं. अगर विकास दर भी कम है और कर्ज भी महंगी दरों पर मिल रहा है, तो भला कोई उद्योग क्यों नये निवेश की बात सोचेगा? दोनों ही लिहाज से उसकी परियोजना व्यावहारिक नहीं रह जायेगी. अर्थव्यवस्था को निवेशवाली मांग और खपतवाली मांग- यही दो चीजें आगे खींचती हैं. निवेशवाली मांग पहले ही बेदम हो चुकी है, क्योंकि उद्योग जगत ने नये निवेश से बिल्कुल ही हाथ खींच रखे हैं. अगर खपतवाली मांग भी टूटने लगी, तो अर्थव्यवस्था उस साइकिल की तरह हो जायेगी, जिसके दोनों पहिये पंचर हो गये हैं.
