जनता भी जिम्मेदारी समझें अपनी

स्थापना दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह कथन एक कटु सत्य है कि झारखंड के पिछड़ेपन के लिए सिर्फ सरकार नहीं, हर नागरिक दोषी है. इस बयान से उन्होंने समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया है. लेकिन परेशानी यह है कि इसके निहितार्थ को कई लोग समझ ही नहीं सके. उनके […]

स्थापना दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह कथन एक कटु सत्य है कि झारखंड के पिछड़ेपन के लिए सिर्फ सरकार नहीं, हर नागरिक दोषी है. इस बयान से उन्होंने समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया है. लेकिन परेशानी यह है कि इसके निहितार्थ को कई लोग समझ ही नहीं सके. उनके कथन को एक उदाहरण से मैं समझाना चाहता हूं.

मान लें, आपने अपने घर में एक सेवक रखा है और सारी जिम्मेदारी उसे दी है. आप उसके काम में कोई हस्तक्षेप नहीं करते, कभी काम के बारे में कुछ नहीं पूछते. इसकी प्रबल संभावना है कि आपका सेवक कामचोरी करेगा. फिर भी आपको कोई फर्क नहीं पड़ता है. अलबत्ता आप अपने दोस्तों को कहते फिरते हैं कि मेरा सेवक कामचोर है और उसे अपना काम दिल लगा कर करना चाहिए, लेकिन यह बात सेवक को कभी नहीं कहते. इसके बाद वह घर के सामान की चोरी भी करने लगता है और आप बेपरवाह अपनी महफिल में मस्त हैं.

लेकिन आपकी इच्छा है कि सेवक ईमानदार हो, अपनी जिम्मेदारी संभालते वक्त उसने जो वादा किया था, उसे पूरा करे. आप ही बतायें कि क्या ये संभव है? ठीक यही स्वप्न जनता देख रही है. अपने घर के सेवक के बारे में तो शायद वे हफ्ते-दो हफ्ते में कोई फैसला ले लेंगे, लेकिन राज्य में 13 वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई समस्या नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं. पढ़े-लिखे, ज्ञानी व प्रतिष्ठित लोग तक कभी राजनीति में दिलचस्पी दिखाते नहीं, अपने क्षेत्र के नेताओं से मिलते नहीं. उनके काम पर प्रश्न उठाते नहीं. तो फिर वे रामराज्य का सपना कैसे देखते हैं!

अगर परिवर्तन चाहिए तो हर नागरिक आगे आकर अपने नेता-विधायक-सांसद का लेखा-जोखा ले, उन पर दबाव बनाये, दिवास्वप्न देख कर बातें न बनाये.
राजन सिंह, ई-मेल से

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