बिहार में सूखे का जायजा लेने के लिए 11 सदस्यीय केंद्रीय टीम का दौरा शुरू होने से प्रभावित किसानों को मदद का भरोसा जगा है. टीम के सदस्य प्रदेश के सूखे से प्रभावित 33 जिलों की चुनिंदा जगहों का दौरा कर रहे हैं. लेकिन, किसानों के सामने असली सवाल यह है कि उन्हें सरकारी मदद कब मिलेगी और इसका आकार क्या होगा.
राज्य सरकार सितंबर माह से ही केंद्र से मदद की गुहार लगा रही थी, लेकिन केंद्रीय टीम का दौरा तब शुरू हुआ है, जबकि धान की कटनी शुरू हो चुकी है. इस साल बिहार को एक ही साथ बाढ़ और सुखाड़ दोनों का सामना करना पड़ा है. एक तरफ जब उत्तर बिहार के जिलों में नेपाल से निकलनेवाली नदियां बाढ़ का कहर बरपा रही थीं, तो दूसरी तरफ मध्य व दक्षिण बिहार के जिलों में आसमान से पानी की जगह तेज धूप के रूप में आग के गोले बरस रहे थे. अर्थात, एक ओर जब फसलें पानी के चलते नष्ट हो रही थीं, तभी राज्य के दूसरे हिस्से में बारिश नहीं होने से खेत परती पड़े थे. बिहार की खेती कृषि पर निर्भर है. ऐसे में सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात कितने खराब रहे हैं.
स्वाभाविक है कि ऐसे हालात से निबटने के लिए केंद्र की मदद जरूरी है. ऐसे में केंद्र सरकार को बिहार के लिए मदद का हिसाब-किताब करते समय उदारता का परिचय देना होगा. यह इसलिए भी जरूरी है कि कि बिहार का हित राष्ट्रीय हित से अलग नहीं है. अगर बिहार जैसे प्रदेश प्राकृतिक व अन्य आपदाओं के कारण फिर से पिछड़ने लगे, तो इससे पूरे देश की आर्थिक-सामाजिक सेहत को क्षति पहुंचेगी. ध्यान देने योग्य तथ्य है कि सूबे के तीन चौथाई से अधिक जिले सूखे की चपेट में हैं. धान का उत्पादन पिछले साल से कम होगा.
इन जिलों के लोग अगर जीने के लिए केवल पेट भरने की चिंता में उलझ गये, तो निश्चित तौर पर इससे प्रदेश के विकास की मौजूदा रफ्तार को झटका लगेगा. रोजी-रोटी की तलाश में बिहार के इन जिलों से होनेवाले पलायन का असर देश के दूसरे शहरों व प्रदेशों पर भी होगा. बिहार सरकार ने सूखे से हुई क्षति की भरपाई के लिए 1200 करोड़ की सहायता की मांग रखी है. केंद्र सरकार को बिहार की जरूरतों का सही आकलन कर राज्य सरकार की मांग पर उदारता से विचार करना चाहिए. साथ ही सहायता राशि देने में विलंब नहीं करना चाहिए.
