विभिन्न तरह के प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हमारे राज्य झारखंड को विशेष राज्य के दरजे की मांग जोरों पर है. राज्य के सारे राजनीतिक दल इस अवसर रूपी गंगा में डुबकी लगाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन पिछले 12 वर्षो के राज्य के इतिहास से तो ऐसा महसूस होता है कि विशेष राज्य का दरजा मिलने के फलस्वरूप केंद्र की ओर से मदद स्वरूप प्राप्त होने वाली राशि से राज्य का विकास हो या न हो, प्रदेश में स्वार्थ की राजनीति करने वाले नेताओं का अवश्य विकास हो जायेगा!
झारखंड राज्य के गठन के समय में कहा जा रहा था कि उन्नति के मसले पर यह राज्य आने वाले समय में भारत का जापान कहलाएगा. पर क्या हुआ? जापान तो छोड़िए, विभाजन से असहाय महसूस कर रहे बिहार ने जिस गति से पिछले दशक में उन्नति की, उसके मुकाबले हम कई गुणा पीछे रह गये.
अब प्रश्न है कि क्या केंद्र सरकार से मिलने वाले विशेष पैकेज से प्रदेश विकास की राह पर लौट आयेगा? बिलकुल नहीं! क्योंकि, नेताओं की नीयत और प्रदेश की नियति एक दूसरे से परस्पर जुड़ी है. अगर नीयत साफ रहती तो खनिज की रॉयल्टी और राजस्व की राशि ही राज्य के विकास के लिए प्र्याप्त थी. इसलिए आवश्यकता आज इस बात की है कि यहां के कार्य संस्कृति की समीक्षा की जाये, उपलब्ध प्राकृतिक और मानव संसाधन का ईमानदारी से उपयोग किया जाये.
अगर ऐसा हुआ और नेताओं की दृष्टि में खोट न होकर उनका ध्यान राज्य के विकास को प्राथमिकता देने पर रहा तो निश्चित रूप से हम कह सकते हैं कि हमारा मौजूदा संसाधन हमें समृद्घ बनाने के लिए काफी हैं. मोहम्मद शमीम अहमद, रोमी, हजारीबाग
