प्रभात खबर का नियमित पाठक होने के नाते मैंने यह पाया है कि यह हर मुद्दे पर बेहतरीन पकड़ और बेबाक टिप्पणी के साथ सामने आया है. फिलहाल मेरा निवेदन है कि यह भारतीय सिनेमा के वर्तमान परिदृश्य पर भी चर्चा करे. मुद्दे की बात यह है कि अभी कितनी ही फिल्में ऐसी बन रही हैं, जो आजकल के युवाओं को गलत संदेश दे रही हैं. उनकी सोच को निमA स्तर पर ले जा रही हैं.
ऐसी फिल्मों के कारण भारतीय सिनेमा अपनी गरिमा खो रहा है. इसलिए इस तरह की फिल्मों के निर्माण पर रोक लगायी जाये. सेंसर बोर्ड की भूमिका और कानून को भी पुनर्परिभाषित किया जाये. अभिभावकों को भी संदेश दिया जाये कि वे अपने बच्चों पर ध्यान दें, समीक्षा करें. छोटे-छोटे बच्चों की मानसिकता पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. आप इस मुद्दे को उठा कर इस सामाजिक बुराई पर लगाम लगवायें का काम करें.
आशिक इकरार, अररिया
