रांची में आनंद ज्वेलर्स में 12.25 करोड़ के सोना, चांदी और हीरे के जेवरात की चोरी हो गयी. झारखंड के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी दुकान से इतनी राशि के गहने की चोरी हुई है. सवाल सिर्फ राशि का नहीं है. जिस तरीके से घटना को अंजाम दिया गया, उससे भविष्य के खतरे साफ-साफ दिख रहे हैं. पुलिस जांच कर ही रही है, पर चोरों को पकड़ने में जिस सीसीटीवी का इस्तेमाल होता है, उसे भी चोर साथ ले गये.
चोरों को पता था कि कैमरे कहां लगे हैं. रिकार्डिग उपकरण को भी चोर साथ ले गये. यानी चोरों ने अपनी ओर से व्यवस्था कर ली थी कि वे कोई सबूत नहीं छोड़ें. खबर तो यह भी है कि दुकान में सायरन भी लगा था. चोरों पहले ही सायरन का तार भी काट दिया. इससे लगता है कि चोर हाइटेक थे. पूरी जानकारी थी कि क्या-क्या उपकरण, कैमरे लगे हो सकते हैं और कैसे उन्हें निष्क्रिय करना है. चोरों ने जिस तरीके से लोहे के कई ग्रिल काटे, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने गैस कटर का भी उपयोग किया होगा.
पूरे शहर में चोरी की घटनाएं बढ़ी हैं पर जिस तरीके से चोर तकनीकी तौर पर समृद्ध हो गये हैं, उस तौर पर पुलिस या प्रशासन नहीं. दुनिया के कई देशों में या भारत में भी कई शहरों में सड़कों पर, चौराहों पर शक्तिशाली कैमरे लगाये गये हैं जिसकी मानिटरिंग पुलिस कंट्रोल रूम से होती है. रांची में कई बार योजना बनी, पर इसे लागू नहीं किया जा सका. अगर प्रमुख सड़कों पर जगह-जगह पर, चौराहों पर कैमरे लगे होते तो अपराध की कई घटनाओं को सुलझाने में मदद मिलती. प्रयास तो यह होना चाहिए कि हर क्षेत्र किसी न किसी कैमरे के दायरे में हो.
चोरों के लिए इन कैमरों को नष्ट करना आसान नहीं हो. कितने कैमरे, कितने सीसीटीवी चोर साथ ले जायेंगे. याद कीजिए दिल्ली में अगर हाइटेक व्यवस्था न होती तो दिसंबर 2012 में बस में घटी सामूहिक दुष्कर्म की घटना के अपराधी शायद पकड़े ही नहीं जाते. रांची पुलिस के सामने चुनौती है कि वह यह साबित करे कि चोर कितने भी चालाक क्यों न हों, वह उनसे ज्यादा चालाक है. यह तभी होगा जब चोर पकड़े जायेंगे. भविष्य के लिए भी प्रशासन को चौकस रहना होगा और अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करना होगा ताकि अपराधी पकड़े जा सकें.
