कोयला घोटाले की जांच जैसे-जैसे बढ़ रही है, कालिख धुलने की बजाय और फैलती दिख रही है. अब सीबीआइ ने मामले की 14वीं एफआइआर में जिस आधार पर पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख और प्रमुख उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया है, उस पर कई सवाल उठ रहे हैं.
हालांकि सवालों से बेपरवाह सीबीआइ ने बिड़ला की कंपनी हिंडाल्को के दिल्ली दफ्तर से 25 करोड़ रुपये नकद भी बरामद किये हैं, जिसका ठोस ब्योरा कंपनी के अधिकारी नहीं दे पाये. पारेख या बिड़ला दोषी हैं या नहीं, यह फैसला अदालत को करना है, परंतु पारेख का यह सवाल तार्किक है कि यदि वे दोषी हैं तो आवंटन के निर्णय के वक्त कोयला मंत्रलय का प्रभार संभाल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘साजिशकर्ता नंबर एक’ बनाया जाना चाहिए.
सीबीआइ का आरोप है कि आठ साल पहले ओड़िशा में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए सुरक्षित दो खदानों के कुछ हिस्से हिंडाल्को को आवंटित करने में धांधली हुई थी. बताने की जरूरत नहीं है कि कोयला, गैस या स्पेक्ट्रम जैसे कीमती प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन का फैसला संबंधित विभाग का सचिव अकेले नहीं कर सकता. ऐसे में नौकरशाह और उद्योगपति पर कार्रवाई हो और सरकार अपनी जवाबदेही स्वीकारने से बची रहे, इस पर सवाल उठना लाजिमी है. और फिर सीबीआइ ने ही 2जी घोटाले में दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा के साथ तत्कालीन मंत्री ए राजा को भी आरोपी बना कर गिरफ्तार किया था.
पारिख के तर्क पर मनमोहन सिंह की चुप्पी ने विपक्ष को फिर से हमलावर होने का मौका दे दिया है. यह पहली बार नहीं है, जब कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री की तरफ उंगली उठी है. घोटाले से जुड़ी कई अहम फाइलें गायब होने पर सरकार की खूब किरकिरी हो चुकी है. सीबीआइ की स्टेटस रिपोर्ट में फेरबदल करवाने की बात सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद कानून मंत्री अश्विनी कुमार को इस्तीफा देना पड़ा था. जाहिर है, प्रधानमंत्री का संतोषजनक स्पष्टीकरण न आने पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर संसद के शीत सत्र तक खिंच सकता है. ऐसे में आर्थिक चुनौतियों से निपटने के नीतिगत फैसलों पर ग्रहण लगना भी तय है.
