एक सामाजिक क्रांति का सूत्रपात

शहर या गांव में एक या दो देवालय हो तो चल सकता है, लेकिन शौचालय तो हर घर में आवश्यक है. स्वच्छता हमारे व समाज के लिए अनिवार्य है. खुले में शौच जाना मनुष्य के लिए काफी हानिकारक हो सकता है. इससे उसके स्वास्थ्य पर तो बुरा प्रभाव पड़ता ही है, साथ ही मानव सभ्यता […]

शहर या गांव में एक या दो देवालय हो तो चल सकता है, लेकिन शौचालय तो हर घर में आवश्यक है. स्वच्छता हमारे व समाज के लिए अनिवार्य है. खुले में शौच जाना मनुष्य के लिए काफी हानिकारक हो सकता है. इससे उसके स्वास्थ्य पर तो बुरा प्रभाव पड़ता ही है, साथ ही मानव सभ्यता के लिए भी यह बेहद शर्मनाक है. यदि शौचालय और देवालय में से एक बनाना हो, तो पहले शौचालय ही बनाना चाहिए.

सुधिजन! जरा सोचें, जिनके घर में इसकी व्यवस्था नहीं है, उन्हें कितनी यातना ङोलनी पड़ती होगी? कितनी पीड़ा से गुजरती होंगी वहां की महिलाएं? बच्चों को कितनी तकलीफ होती होगी? बुजुर्गो के लिए रात्रि में बाहर जाना कितना असुविधाजनक होता होगा? मीडिया में प्रसारित खबरें बताती हैं कि आकड़ों के अनुसार, वर्तमान में शौच के लिए बाहर जाने वाले 52 करोड़ लोगों में 5 करोड़ ऐसे हैं, जिनके हाथ में मोबाइल है. इसका साफ मतलब यह निकलता है कि देश में मोबाइल का इस्तेमाल करनेवाले कम लोग हैं, जबकि शौचालय का इस्तेमाल करनेवाले कम.

हमें खुद इसके बारे में सोचना होगा कि शौचालय और देवालय में किसे सबसे ऊपर रखना चाहिए. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश इस बात पर लगातार जोर देते रहे हैं, साथ ही उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ सार्थक पहल भी की है, जो निस्संदेह स्वागत योग्य है. बीते दिनों इस मुद्दे भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि इस देश में देवालय से ज्यादा जरूरी शौचालय है. लेकिन इस पर मीडिया में छायी बहस यह बताने के लिए काफी थी कि हमारे नेताओं को हर मौके पर राजनीति करने से ही सरोकार है, न कि जनता के हितों का ख्याल रखने से.
रितेश कुमार दुबे, कतरास

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