मुजफ्फरनगर दंगे के जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई में विलंब तथा दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के लिए अब तक कोई ठोस कदम न उठाना, एक ओर जहां देश में बेगुनाहों की लाशों की राजनीति कर सत्ता तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा रखनेवालों के मन को बढ़ावा देता है, वहीं दूसरी ओर एक लोकतांत्रिक देश की अमनपसंद जनता की एक बहुत बड़ी आबादी के भरोसे को तोड़ता है. दंगे में लगभग 50 लोग मारे गये. किसी का पति, किसी का बेटा, किसी का भाई गया. लोगों के घर उजड़ गये. देश में बम विस्फोट कर लोगों की जान लेनेवालों को हम आतंकवादी कहते हैं, लेकिन इतने लोगों की मौत और हजारों लोगों को बेघर होने को मजबूर करने के जिम्मेदार लोगों को क्या कहेंगे?
अब तो इस मुद्दे को लेकर गंदी राजनीति भी शुरू हो गयी है. सपा, बसपा, भाजपा आदि पार्टियां एक-दूसरे को जिम्मेदार बताने में भिड़ी हैं. किसी को अपनी गलती का एहसास तक नहीं है. राज्य सरकार मीडिया के सामने अपनी सफाई देकर अपने लोगों को पाक-साफ बताने में लगी है. केंद्र बयानबाजी में लगा है कि दंगा करानेवालों को बख्शा नहीं जायेगा. हमदर्दी का दिखावा सभी करते हैं, पर यह बात खुल कर कोई नहीं कह रहा है कि दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के लिए हम क्या कर रहे हैं. दंगे के कारण गांव छोड़ चुके लोग जहां शरण लिये हुए हैं, वे कैंप भी सरकार की तरफ से नहीं हैं. दंगे में हताहत होनेवाले किसी एक मजहब के व्यक्ति या परिवार नहीं हैं. राजनीतिक पार्टियां 2014 के चुनाव में वोट के नफा-नुकसान का हिसाब रखते हुए आगे बढ़ रही हैं. मानवता तो जैसे मर गयी है. राज्य सरकार भी लाचार दिखती है. ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार को बयानबाजी छोड़ ठोस कदम उठाना चाहिए, जो दंगा पीड़ितों और देश के हित में हो.
मोहम्मद सलीम, बरकाकाना
