नयी राजनीति में व्यवस्था परिवतर्न के लिए कुछ अच्छे सिद्धांतों के साथ आयी आम आदमी पार्टी ने त्याग, तपस्या, सादगी और कमखर्ची के साथ शासक के स्थान पर सिर्फ सेवक बन कर देश सेवा की जो बीड़ा उठाया था, वह आज धूमिल होने लगा है. पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र, पारदर्शिता, सामूहिक नेतृत्व, लोकपाल और जनमत आदि का अभाव स्पष्ट रूप से झलकने लगा है.
अब यह भी देश की अन्य पार्टियों की तरह ही भेड़चाल चलने लगी है. जैसे शाम को कौव्वा मीटिंग करके गंदी चीजों पर मुंह नहीं मारने की कसम खाते हैं और सुबह होते ही वे फिर अपने पुराने धंधे पर चल पड़ते हैं, उसी तरह आम आदमी पार्टी भी राजनीति के कुत्सित कार्यो से दूर रहने की कसम खाने के बाद उन्हीं राजनीतिक दलों की राह पर चलने लगी है. इस बीच अराजकता में दिल्ली की जनता त्रस्त है.
वेद, मामूरपुर, नरेला
