देखे जाते नहीं मुझसे हारे हुए..

पंकज कुमार पाठक प्रभात खबर, रांची इस विश्वकप में भारतीय क्रिकेट टीम से जो भी टीम भिड़ी, हमारे खिलाड़ियों ने उसका वही हाल किया, जो धोबी घाट पर धोबी कपड़ों के साथ करता है. लेकिन टीम इंडिया सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों खुद धुल गयी. हमारा गब्बर, बब्बर शेर की तरह नहीं दहाड़ पाया. पचास […]

पंकज कुमार पाठक

प्रभात खबर, रांची

इस विश्वकप में भारतीय क्रिकेट टीम से जो भी टीम भिड़ी, हमारे खिलाड़ियों ने उसका वही हाल किया, जो धोबी घाट पर धोबी कपड़ों के साथ करता है. लेकिन टीम इंडिया सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों खुद धुल गयी. हमारा गब्बर, बब्बर शेर की तरह नहीं दहाड़ पाया.

पचास से पहले ही उसने निकास का रास्ता पकड़ लिया. विराट को खुर्राट जॉनसन ने सिर्फ एक रन पर आउट कर दिया, तो देशभक्त क्रिकेटप्रेमी ‘अनुष्का’ पर पिल पिड़े. नवरात्र के दिनों में स्त्रीशक्ति की पूजा करनेवाले भारतीयों ने अनुष्का की खूब आरती उतारी. रैना सात फेरों की ललक में सिर्फ सात रन बना कर चलते बने.

इस तमाशे के बाद करोड़ों भारतीय दर्शकों ने अरबों की संख्या में उच्चस्तरीय ‘मेड इन इंडिया’ गालियां अपनी टीम को दीं. फेसबुक-ट्वीट्र पर टीम की वैसी ही बेइज्जती हो रही है, जैसे लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस की हुई थी. हालांकि गाली-गलौज वही दर्शक कर रहे हैं, जिन्होंने इस मैच को तन की आंखों से देखा. ऐसे अज्ञानियों को माफ कर देना चाहिए.

जो गहरे पानी में उतरे हुए लोग हैं, उन्होंने इस मैच को ‘मन’ की आंखों से देखा. उनकी नजरों में यह भारत की हार नहीं, भारतीय परंपरा और संस्कृति की जीत है. मैच हार कर अपनी टीम ने ऋषि-मुनियों के देश भारत का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है.

विश्व कप के मेजबान ऑस्ट्रेलिया की टीम को न हरा कर, भारतीय टीम ने ‘कृतज्ञ’ होने का परिचय दिया है. साथ ही बता दिया कि त्याग और समर्पण की भावना आज भी भारतीयों के दिलों में जिंदा है. आखिर, कैसे और क्यों हराता भारत, ऑस्ट्रेलिया को? महज एक तुच्छ विश्व कप के लिए, जो भारत के पास पहले से दो-दो हैं?

उस देश के खिलाड़ियों को हराना हमें शोभा देता, जिसने हमारी टीम को मेहमान बना कर अपने देश बुलाया? जो टीम के लोगों के सेवा-सत्कार में दिन-रात एक किये हुए हैं? पल-पल इस बात का ख्याल रख रहे हैं कि हमारी टीम के लोगों को किसी भी तरह की परेशानी या तकलीफ न हो? करोड़ों विश्व कप कुरबान हैं, ऐसे मेजबान देश पर.

वसीम बरेलवी साहब ने हम भारतीयों की फितरत के बारे में क्या खूब कहा है- ‘‘देखे जाते नहीं मुझसे हारे हुए, इसलिए मैं कोई जंग जीता नहीं.’’ कुछ लोगों को हमारी बात पर ऐतराज है, वे तर्क दे रहे हैं कि ऑस्ट्रेलियाई टीम तो भारत आकर हमें हरा कर गयी थी. उन्हें नहीं पता कि हमें बचपन से ही सिखाया गया है, अतिथि देवो भव. तब ऑस्ट्रेलिया हमारा मेहमान था और हम ऐसे लोग हैं, जो न मेहमानों को दुखी करते हैं और न मेजबानों की बेइज्जती. यकीन मानिए, टीम ऑस्ट्रेलिया को आज जीत कर जितनी खुशी नहीं हुई होगी, उससे कहीं ज्यादा हम ‘मन’ की आंखों से देखनेवाले दर्शकों को हार कर हुई है. काश! आस्ट्रेलियाई कभी हमारी महानता को समझ पाते.

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