झारखंड में बीते दो-तीन सालों में माओवादी और अन्य हथियारबंद संगठनों द्वारा हिंसा की बड़ी वारदातों में यकीनन कमी आयी है. पुलिस कैंपों, थानों, चौकियों पर हमले, बारूदी सुरंगों के धमाके घटे हैं. हर साल दर्जनों की संख्या में पुलिसवालों और आम लोगों को उग्रवादी संगठन मौत के घाट उतार देते थे, यह सिलसिला कुछ थमा हुआ है.
लेकिन शनिवार रात को जो हुआ, उससे यह साफ हो गया है कि माअवोदी अपने इलाके के विस्तार के लिए तैयारी में जुटे हुए हैं. वे पुलिस की बंदूकों की ताकत के आगे थोड़ा पीछे जरूर हटे हैं, पर उनका इरादा व मंशा बिल्कुल साफ है. और वह है, ‘मुक्त क्षेत्रों’ में अपनी समानांतर सरकार कायम करना. इसमें जो बाधा बनेगा वह मारा जायेगा. इसी रणनीति के तहत, माओवादियों ने लातेहार-लोहरदगा जिले की सीमा पर स्थित मुरमू गांव के जमींदार, भाजपा नेता और झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ठाकुर बालमुकुंद नाथ शाहदेव के दो भाइयों और भतीजे की हत्या कर दी.
शाहदेव परिवार की अपने इलाके में गहरी पैठ और दबदबा है. इस खानदान के पास दर्जनों की तादाद में लाइसेंसी हथियार हैं. जिन तीनों की हत्या की गयी, वे भी हथियारों से लैस थे. माओवादी तीनों हथियार भी लूट ले गये. वहां मौजूद अन्य 10 लोगों को माओवादियों ने छोड़ दिया. बात साफ है, माओवादियों का निशाना सिर्फ शाहदेव परिवार था. यह परिवार अपने बूते बरसों से माओवादी गतिविधि को अपने आसपास के इलाके में रोके हुए था. हत्या की खबर पुलिस को शनिवार की रात में मिल गयी थी, लेकिन वह रविवार की सुबह ही मौका-ए-वारदात पर जाने की हिम्मत जुटा पायी. यानी, अब भी पुलिस के पास रात में जंगल वाले इलाकों में कूच करने की हिम्मत नहीं है.
जब पुलिस खुद को महफूज नहीं मान रही, तो गांववाले किसके दम पर माओवादियों की मुखालफत करने का जोखिम उठायें? जब से रघुवर दास मुख्यमंत्री बने हैं, वह हर भाषण में यही कहते हैं कि छह महीने में नक्सलवाद का खात्मा कर देंगे. उनकी यह छह महीने की अवधि कब पूरी होगा, पता नहीं. सरकार माओवादियों के खिलाफ एक्शन प्लान बनाने से पहले यह जान ले कि अब इस मर्ज का इलाज पुराने र्ढे से संभव नहीं है.
