23 मार्च को पूरी दुनिया में विश्व मौसम दिवस मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों के अलावा भारत का भी इस क्षेत्र में काफी योगदान रहा है. पूर्व के विपरीत आज मौमस विज्ञान में केवल मौसम संबंधी विधा ही शामिल नहीं है, बल्कि इसमें पूरा भू-विज्ञान समाहित है. इसका इस्तेमाल बाढ़, सूखा और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा का अनुमान लगाने के लिए किया जा रहा है. भारत ने इसका उपयोग नाविकों, समुद्री जहाजों और समुद्री तूफानों से बचाव के लिए भी किया जा रहा है.
भारत ने अंतरिक्ष में मौसम परीक्षण के लिए 10 उपग्रहों को प्रक्षेपित कर मौसम विज्ञान के क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन किया है. इसके अलावा, भारत ने 10 सुदूर संवेदी उपग्रह भी प्रक्षेपित किये हैं. अंतरिक्ष में उपग्रहों का परीक्षण करने के अलावा भारतीय वैज्ञानिक मौसम और जल विज्ञान की जानकारी हासिल करने के लिए अंटार्कटिका में भी जाकर अध्ययन किया है और यह क्रम आज भी बदस्तूर जारी है.
समुद्री हलचलों की जानकारी हासिल करने के लिए भारत ने वैश्विक समुद्री परीक्षण तंत्र के हिंद महासागर अवयव की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इतना कुछ करने के बावजूद हम जलवायु सुरक्षा के मामले में पिछड़ते नजर आ रहे हैं. हालांकि डब्ल्यूएमओ ने चेतावनी दी है कि जलवायु की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम नहीं उठाये जाने से भविष्य में भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.
जलवायु परिवर्तन के उपशमन के लिए जिन कदमों पर विचार किया गया है वे हमारी भावी जलवायु को बचाने के लिए नाकाफी हैं. इस दिवस पर देश के विभिन्न हिस्सों में बैठकें, संगोष्ठियां और अन्य कार्यक्र म होते हैं, लेकिन इन बैठकों का नतीजा निकलता नजर नहीं आ रहा है. सरकार को इसके लिए कारगर कदम उठाने होंगे.
पूनम गुप्ता, मधुपुर
