एक तरफहमारी सरकार देश में बुलेट ट्रेन चलाने कि सोच रही है और दूसरी तरफ हमारे देश की रेल की स्थिति देखनेवाला कोई नहीं. लगभग हर छह या सात महीने में देश के अखबारों में अमूमन किसी न किसी बड़े रेल हादसे की खबर आ ही जाती है.
पिछले नौ महीने में ही नौ छोटे-बड़े हादसे हो चुके हैं. इसी कड़ी में शुक्र वार को एक नया नाम जुड़ गया जनता एक्सप्रेस का. इस रेल हादसे से एक बार फिर साबित हो गया कि भारतीय रेल में सफर करनेवालों कि सुरक्षा भगवान भरोसे ही है. हर साल रेल बजट में यात्री सुविधाओं और रेलवे की साज-संभाल के लिए करोड़ों रु पये दिये जाते है. फिर भी हादसे नहीं रु कते, आखिर क्यों? जिस देश में रेल कि हालत इतनी खस्ता है, वहां बुलेट ट्रेन कैसे सरपट दौड़ेगी? सरकारें रोज नयी घोषणाएं तो कर देती हैं, पर वो जमीनी हकीकत से बहुत दूर होती हैं.
-विवेकानंद विमल, मधुपुर
