आज नारी अपना सम्मान खुद खोती जा रही है. अपने रहन-सहन को पश्चिमी सभ्यता में ढालना, पुरु षों के झूठे वायदों में आकर अपना सर्वस्व निछावर करने जैसी गलती करना, बड़े-बुजुर्गो का सम्मान न करना, पुरु षों को नारी होने की धौंस दिखा कर प्रताड़ित करना, अपनी मनमानी करना, मिली आजादी का गलत इस्तेमाल करना ही नारियों के सम्मान पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है.
आज भी जहां नारी अपनी मर्यादा में रहती हैं, उसे सम्मान दिया जाता है. सीता माता यदि लक्ष्मण द्वारा खींची गयी रेखा पार नहीं करतीं, तो शायद उनका हरण नहीं होता. द्रौपदी यदि अमर्यादित बोल नहीं बोलती तो महाभारत नहीं होता. आज भी दया, ममता, सहनशीलता की मूर्ति, मां को सम्मानित किया जाता है, परंतु वो नारी सम्मान पाने का हकदार नहीं होती है, जो बिनब्याही मां बन कर नवजात को कचरे में डाल देती है.
मीरा बैद, रांची
