होली पर चढ़ गया फिर बजट का रंग,
मध्यम वर्ग का जीवन हो गया बदरंग.
पुआ-पूड़ी और मिठाई, सब फीका का फीका,
सत्ता ने सिखाया इस बार जीने का नया सलीका.
क्या-क्या सपने दिखला कर आयी थी यह नयी सरकार,
शासन मिलते ही हो गयी सीलन भरी दीवार.
मन आहत और दिल पर लग गयी है ठेस,
जाने आगे कैसा होगा मेरे देश का भेष.
चिकनी-चुपड़ी बातों से सभी हमें भरमाते हैं,
अपनी गोटी साधने में जरा भी नहीं शर्माते हैं.
ऊपर-ऊपर कहता हूं, दिल है बिलकुल साफ,
होली का हुड़दंग समझ कर करना भैया माफ.
संजय, कांके रोड, रांची
