बिहार में स्वाइन फ्लू का दायरा जिस तरह बढ़ रहा है, वह चिंता की बात है. अब तक पटना समेत सात जिलों में पांच दर्जन से ज्यादा लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं. हाल में मौसम का मिजाज बदलने से तापमान गिरा है, जिससे स्वाइन फ्लू के वायरस को अनुकूल माहौल मिला है. इसकी रोकथाम और उससे बचाव के लिए स्वास्थ्य विभाग ने अपने स्तर से मुकम्मल तैयारी की है. लेकिन, यह व्यवस्था तब जमीन पर उतरी जब स्वाइन फ्लू ने अपने पांव फैला लिये थे.
यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में इस गंभीर बीमारी की ओर जिम्मेवार अफसरों का ध्यान नहीं गया. लोगों को इसके प्रति जागरूक करने और शुरुआत में ही इसके लिए जरूरी दवाइयों के इंतजाम में सक्रियता नहीं दिखी. अब भी इस बीमारी के इलाज में सबसे बड़ी परेशानी जांच को लेकर है. पूरे राज्य में सिर्फ पटना में ही इसकी जांच की व्यवस्था है. सरकार ने सभी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में सैंपल इकट्ठा करने की व्यवस्था की है, लेकिन उसको जांच के लिए पटना लाने और फिर रिपोर्ट आने में इतना समय लग जाता है कि मरीज पर रोग का असर गहरा हो जाता है.
निजी अस्पतालों में जांच महंगी है. स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए वैक्सीन भी नहीं पहुंची है जिससे डॉक्टर भी इलाज में डर रहे हैं. माना कि प्रकृति पर तो इनसान या विज्ञान का वश नहीं है, लेकिन जहां तक इनसान की पहुंच है, वहां तक तो उपाय किये जा सकते हैं.
बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव प्रकृति के हाथ में है, लेकिन स्वाइन फ्लू से जो पीड़ित हैं, उन्हें उचित और समय से बेहतर इलाज की व्यवस्था कर उन्हें राहत देने की दिशा में काम तो सरकार और समाज के हाथों में है. स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन को इसे सबक के रूप में लेना चाहिए. डेंगू और जापानी इंसेफ्लाइटिस के उदाहरण सामने हैं, जो खास मौसम में होते हैं. भविष्य में ऐसी बीमारियों से निबटने के लिए योजनाबद्ध तरीके से इंतजाम होने चाहिए. इसके तहत एक तरफ लोगों को जागरूक कर बचाव के उपाय होने चाहिए, तो दूसरी तरफ पीड़ितों के इलाज के लिए पर्याप्त मात्र में वैक्सीन और दवाइयों की व्यवस्था होनी चाहिए.वायरस के कारकों की पहचान और जड़ पर प्रहार भी इंतजाम का हिस्सा होना चाहिए.
