बिहार में पिछले कुछ महीनों से चल रही राजनीतिक अस्थिरता पर अब विराम लग गया है. नीतीश कुमार ने चौथी बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. उन्हें विकास के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक और अवसर मिला है. यह वही एजेंडा है, जिसने बिहार को देश-दुनिया में नयी पहचान दी और बिहारियों में आत्मविश्वास जगाया. इसके लिए उनके पास नौ माह का समय है. सामने विधानसभा चुनाव हैं.
लिहाजा चुनौतियां कम नहीं हैं. हालांकि उनके पास बेहतर बिहार बनाने की संकल्पना और इसे चलाने का अनुभव है. इसलिए यह विश्वास है कि वे फिर से राज्य को पटरी पर ला सकेंगे और उन कड़ियों को जोड़ सकेंगे, जो लोकसभा चुनाव के बाद से उत्पन्न परिस्थितियों में बिखरने लगी थीं. मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दूसरी और तीसरी पारी में करीब साढ़े आठ साल तक नीतीश कुमार ने सुशासन और विकास के जिस ठोस विश्वास की बुनियाद तैयार की थी, उसे लेकर संशय की स्थिति पैदा हो गयी थी. कानून-व्यवस्था को लेकर स्थिति बेहद गंभीर हो गयी थी.
लोग एक बार फिर असुरक्षा के भाव में जीने को मजबूर थे. पुलिस और प्रशासन की पकड़ ढीली होने गली थी. इसने लोगों को कानून हाथ में लेने के लिए मजबूर किया था. विकास की कई बड़ी परियोजनाओं पर विराम लग गया था या उनकी गति मंद पड़ने लगी थी. राजनीतिक उथल-पुथल का माहौल बन गया था, जिसका प्रभाव शासन के सभी क्षेत्रों पर पड़ रहा था. इस पर राज्य ही नहीं, बाहर भी चिंता की जाने लगी थी. फिर से मुख्यमंत्री की कुरसी संभालने के बाद नीतीश कुमार के लिए इस स्थिति से बिहार को निकालने की बड़ी चुनौती होगी.
उन्हें फिर से सरकार और शासन के प्रति जनता में विश्वास पैदा करना होगा और सुशासन के एजेंडे को तेजी से एवं प्रभावी ढंग से लागू करना होगा. भ्रष्टाचार पर अंकुश उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है. नयी सरकार को अपनी प्राथमिकता सूची में इसे सबसे ऊपर रखना होगा. केंद्र और राज्य की सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता को बढ़ाना होगा. यह चुनाव का साल है और इसके ठीक पहले उन्हें राज्य की सेवा का एक मौका और मिला है. यह उनके लिए अवसर भी है और चुनौती भी.
