देरी का बोझ

अर्थव्यवस्था को आधार और गति देने में इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी भूमिका होती है. इसी वजह से सरकारें और उद्योग जगत इनके विस्तार की कोशिश में लगातार लगे रहते हैं. लेकिन ऐसी परियोजनाओं का निर्धारित समय और लागत से पूरा होना भी जरूरी है. इस संदर्भ में केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी ताजा […]

अर्थव्यवस्था को आधार और गति देने में इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी भूमिका होती है. इसी वजह से सरकारें और उद्योग जगत इनके विस्तार की कोशिश में लगातार लगे रहते हैं. लेकिन ऐसी परियोजनाओं का निर्धारित समय और लागत से पूरा होना भी जरूरी है.

इस संदर्भ में केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी ताजा सूचनाएं चिंताजनक हैं. देशभर में ऐसी चार सौ परियोजनाएं हैं, जिनके पूरा होने में देरी के कारण खर्च में चार लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है. फिलहाल ऐसी 578 परियोज���ाएं हैं, जो लंबित हैं.
इनमें से 190 में देरी एक माह से 12 महीने, 121 में 13 से 24 महीने, 146 में 25 से 60 महीने तथा 121 में 61 महीने से अधिक है. अगर इन आंकड़ों का औसत लगाया जाये, तो देरी की अवधि लगभग 39 दिन की है. देरी की अनेक वजहें हैं, जैसे- जमीन का अधिग्रहण, वन से जुड़ी मंजूरी और साजो-सामान की आपूर्ति.
इनके अलावा धन और श्रम की कमी, मुकदमे, कानून-व्यवस्था, उग्रवाद आदि की वजह से भी समय पर परियोजनाओं को पूरा करने में बाधाएं आती हैं. मंत्रालय की रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि लागत के संशोधित अनुमानों और समय-सारणी के बारे में कई एजेंसियां सही जानकारी उपलब्ध नहीं कराती हैं.
अगर इन कारणों का विश्लेषण किया जाये, तो प्रबंधन की क्षमता में कमी तथा परियोजना की तैयारी में सभी कारकों का संज्ञान नहीं लेने का रवैया मुख्य रूप से सामने आता है. पिछले कुछ सालों से प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर से निगरानी की प्रणाली स्थापित होने से अनेक लंबित परियोजनाओं को पूरा करने में कामयाबी मिली है, लेकिन अभी भी अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है.
अर्थव्यवस्था में गिरावट और नगदी व निवेश में संकुचन से देरी बढ़ने की आशंका भी है. ऐसे में अन्य अहम कारकों पर ध्यान देने की जरूरत है. यदि परियोजनाएं सही समय पर और समुचित लागत के साथ पूरी होती हैं, तो उनके लाभ भी आर्थिक गतिविधियों को जल्दी मिलने लगेंगे तथा बढ़े हुए खर्च के बोझ से भी बचा जा सकेगा.
ये परियोजनाएं निर्माण के दौरान व्यापक रोजगार के अवसर पैदा करती हैं और पूरा होने के बाद भी काम उपलब्ध कराने का बड़ा माध्यम होती हैं. कई बार समुचित संसाधनों और अन्य कारणों से काम ठप हो जाने से बेरोजगारी में इजाफा हो जाता है. बनने के समय और बाद में हर परियोजना के साथ अनेक सहयोगी आर्थिक गतिविधियों भी विकास होता है.
उदाहरण के लिए, अगर एक राजमार्ग बनता है, तो वाहन तथा होटल के कारोबार में वृद्धि होती है तथा किनारे बसे इलाकों में मौके पैदा होते हैं. देरी केवल लागत के लिए ही संकट नहीं होती, बल्कि वह उद्देश्यों को भी कुंद करती है. इससे पूंजी भी फंस जाती हैै. इस स्थिति में सुधार के लिए सरकार और संबंधित एजेंसियों को त्वरित उपायों पर ध्यान देना चाहिए.

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