देश में संविधान के प्रति, जनता के प्रति, किसानों-मजदूरों के प्रति वर्तमान सरकारें अगर गलत काम करने लगें, तो क्या इस देश के पढ़े-लिखे लोगों या छात्रों को सरकार के उस गलत कार्य को अनदेखा कर अपने काम में ही लगे रहना चाहिए या उन्हें उस असंवैधानिक कार्य का विरोध करना चाहिए?
जिसको देखो वही कहता है कि छात्रों को सिर्फ पढ़ना चाहिए. यह तर्क इतना बचकाना व हास्यास्पद है कि लगता है राजनीति में होना केवल दागियों, भ्रष्टाचारियों व मॉफियाओं का ही विशेषाधिकार है.
सवाल है कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान जैसे लाखों नौजवान अपनी पढ़ाई-नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में नहीं कूदते, तो क्या यह देश 1947 में स्वतंत्र हो पाता! क्या इन वीर नौजवानों का उस समय लिया गया निर्णय व उनका कर्तव्य निरर्थक था? बाबा रामदेव को सीएए का विरोध करनेवाले विश्वविद्यालयों के छात्रों को अपनी अनर्गल सलाह नहीं देना चाहिए.
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
