ब्रेकिंग न्यूज सिंड्रोम का शोर-शराबा

भारतीय मीडिया ज्यों-ज्यों डिजिटल हो रहा है, अपनी विस्वसनीयता खोता जा रहा है. जब तक, पत्रकारों का काम, प्रिंट और रेडियो तक सिमित था, तब तक उनके आलेख एवं रिपोर्ट निष्पक्ष हुआ करते थे. जबसे 24 घंटों वाला न्यूज चैनलों का मकड़जाल फैला, तबसे यह एक बाजार की शक्ल अख्तियार कर चुका है. ‘रामनाथ गोयनका […]

भारतीय मीडिया ज्यों-ज्यों डिजिटल हो रहा है, अपनी विस्वसनीयता खोता जा रहा है. जब तक, पत्रकारों का काम, प्रिंट और रेडियो तक सिमित था, तब तक उनके आलेख एवं रिपोर्ट निष्पक्ष हुआ करते थे. जबसे 24 घंटों वाला न्यूज चैनलों का मकड़जाल फैला, तबसे यह एक बाजार की शक्ल अख्तियार कर चुका है.

‘रामनाथ गोयनका एक्सलेंस इन जर्नलिज्म’ पुरस्कार समारोह को संबोधित करते हुए हमारे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बिलकुल सही कहा कि ब्रेकिंग न्यूज सिंड्रोम के शोर-शराबे में संयम और जिम्मेदारी के मूलभूत सिद्धांत की अनदेखी की जा रही है.

आज सच एवं पुष्ट समाचार के बदले सबसे पहले दिखाने की होड़ है. बहसों के शोर में कौन क्या कह रहा है, कुछ सुनायी नहीं पड़ता. निष्पक्षता एवं निडरता तो पत्रकारों के शब्दकोष से गायब कर दिया गया है. ऐसे में यही कहा जा सकता है पत्रकारिता का सुनहरा दौर अब खत्म होता जा रहा है.

जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

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