ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंकने से आवाज तो छपाक की आती है, मगर तरंगों की हलचल दूर तक जाती है. दिल्ली की तेजाब पीड़िता की जद्दोजहद को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने का साहस निश्चित रूप से सराहनीय है. किरदारों के नाम में क्या रखा है, जो बवाल बन जाये. माना कुछ किरदारों के नाम बदल भी जायें, तो क्या समाज के विकृत चेहरे को दिखाती फिल्म का बायकॉट कर देना चाहिए?
सोशल मीडिया पर अपशब्दों की तेजाबी बौछार समाज को भी झुलसा देगी. देश में पद्म पुरस्कारों से सम्मानित नामचीन कलाकारों की बड़ी जमात ने हमारी सांस्कृतिक धरोहर को पहचान दी है. संस्कार और संस्कृति का पाठ पढ़ाते ज्ञानी क्यों भूल जाते हैं कि जहां कला पूजी जाती है, वहां कलाकारों से घृणा की कोई जगह नहीं है.
एमके मिश्रा, रातू, झारखंड
