बेघरों के लिए बने आश्रय स्थल

बढ़ती सर्दी में मुंशी प्रेमचंद की रचना ‘पूस की रात’ के पात्र हल्कू और उसके जबरे कुत्ते की छवि आंखों के सामने तैरने लगती है, जब आज भी फुटपाथों पर इंसान और उसके वफादार को रात के जमा देनेवाली ठंढ में सोते देखता हूं. जिंदगी की इस जद्दोजहद को देखता हूं, तो कलेजा मुंह को […]

बढ़ती सर्दी में मुंशी प्रेमचंद की रचना ‘पूस की रात’ के पात्र हल्कू और उसके जबरे कुत्ते की छवि आंखों के सामने तैरने लगती है, जब आज भी फुटपाथों पर इंसान और उसके वफादार को रात के जमा देनेवाली ठंढ में सोते देखता हूं.
जिंदगी की इस जद्दोजहद को देखता हूं, तो कलेजा मुंह को आ जाता है. फुटपाथ पर दिनभर रोजी-रोटी का जुगाड़ और रात में प्रकृति की मार, आखिर इंसान ही तो हैं ये. सरकार, प्रशासन और समर्थवान इंसानों से विनम्र प्रार्थना है कि इन बेघर तबकों के लिए आश्रय स्थल बनवायें, कंबल की व्यवस्था करें, सड़क किनारे अलाव की व्यवस्था करें, ताकि पूस की रात के ये हल्कू जीवन की जंग में हार कर रुक न जायें.
देवेश कुमार देव, गिरिडीह, झारखंड

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