इस पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का मनुष्य द्वारा अपनी हवस और लालच के वशीभूत होकर इतना जबरदस्त दोहन और इसके साथ ही इतना प्रदूषण किया गया है कि अब इस धरती का धैर्य चुकने लगा है. धरती इसके प्रतिरोधस्वरूप कभी तूफान, कभी अतिवृष्टि, कभी सुनामी, तो कभी मौसम असंतुलित करके मनुष्य को बार-बार चेतावनी दे रही है.
पता नहीं कितनी बार दुनिया के तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा इस असंतुलन को ठीक करने के लिए वैश्विक जलवायु सम्मेलन हो चुके हैं, परंतु कुछ देशों के अपने स्वार्थ इन सम्मेलनों के उद्देश्यों पर पानी फेर देते हैं. हालांकि, जब इन असंतुलनों से यह धरती नष्ट होगी, तो वे भी उस लपेटे में आयेंगे ही. इसलिए अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर संपूर्ण मानव मात्र के हित की सोच पर विचार करके ही कोई निर्णय करना चाहिए. पूरी मानवता मैड्रिड के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन की सफलता की मंगल कामना करती है.
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
