सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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मंदी की व्याख्या कई तरह से की जा सकती है, बशर्ते व्याख्या करनेवाला अर्थशास्त्री न हो. क्योंकि अर्थशास्त्री तो उसकी व्याख्या एक ही ढंग से करता है और ऐसा करते हुए वह ऊबता भी नहीं. दूसरों को उबा देता है. उसकी दृष्टि में मंदी आर्थिक संकट की उस स्थिति को कहते हैं, जिसमें रोजगार और कारोबार लगभग खत्म हो जाते हैं. इन्हीं लोगों की वजह से अंग्रेजी में मंदी को ‘डिप्रेशन’ कहा जाता है, जिसका दूसरा अर्थ ‘अवसाद’ होता है.
लेकिन नेता मंदी की तरह-तरह से व्याख्या करके अवसादग्रस्त जनता को भी खिलखिलाने पर मजबूर कर देते हैं. उनकी नजर में मंदी मन की एक धारणा मात्र है, एक वहम भर है.
जो मन पर काबू पा लेते हैं, वे इस धारणा से क्या, सभी धारणाओं से मुक्त हो जाते हैं. और वहम का इलाज तो लुकमान के पास भी नहीं था. उनकी नजर में अव्वल तो मंदी है नहीं, और अगर है भी, तो फायदेमंद है. इसके पीछे गीता का वह दर्शन है कि जो होता है, अच्छा ही होता है, जो हुआ, अच्छा ही हुआ और जो होगा, अच्छा ही होगा… आदि. सारी दुनिया में मंदी एक खराब चीज मानी जाती है, पर भला हो हमारे नेताओं का, जिनके चलते भारत में वह एक अच्छी चीज मानी जाती है.
मंदी ने बाजार में ही नहीं, बल्कि राजनीति में भी मंदड़िये और तेजड़िये पैदा कर दिये हैं. हो भी क्यों न, आखिर राजनीति भी अब एक बाजार ही जो बन गयी है.
मंदड़िये भविष्य में माल के मूल्य गिरने की उम्मीद करते हैं, तो तेजड़िये मूल्य बढ़ने की. विपक्षी दल मंदड़ियों की भूमिका निभाते हैं और इस उम्मीद में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं कि भविष्य में सत्ताधारी दल की गलतियों से जनता की नजर में उसका मूल्य गिरेगा और वह खुद उन्हें सत्ता से हटाकर विपक्षियों को चुन लेगी. उधर सत्ताधारी दल मंदी में भी तेजी की हवा बनाये रखकर तेजड़ियों की भूमिका निभाता रहता है.
राजनीति के तेजड़िये अव्वल तो मंदी को मंदी ही नहीं समझते, और समझते भी हैं तो उसे लाभदायक बताते हैं. सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है, इसलिए सावन में अंधी बनायी गयी जनता को भी या तो मंदी दिखायी नहीं देती, या फिर वह भूखी रहकर या घास की रोटियां खाकर भी दुश्मन देश को मजा चखाने के लिए तत्पर दिखती है. हद तो तब होती है, जब ऐसे नेता पलटकर मंदी का ठीकरा जनता पर ही फोड़ते हैं. जैसे ऑटो-सेक्टर में मंदी का कारण उनकी नजर में युवाओं द्वारा कारें खरीदना छोड़कर ओला-उबेर की टैक्सियां इस्तेमाल करना है.
वे ही युवा अब इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए बताने लगे हैं कि टॉयलेट पेपर की खरीद इसलिए घट गयी है, क्योंकि लोग उनकी जगह सड़कछाप लेखकों की किताबें इस्तेमाल करने लगे हैं. ‘भेल’ कंपनी इसलिए घाटे में है, क्योंकि लोग भेलपूरी की जगह पानी-पूरी ज्यादा खाने लगे हैं. पारले-जी के बिस्कुट इसलिए नहीं बिक रहे, क्योंकि कुछ पत्रकार अब उनके बजाय पेडिग्री खाने लगे हैं.
