मुकुल श्रीवास्तव
टिप्पणीकार
sri.mukul@gmail.com
मेरे व्हाॅट्सएप पर एक जोक आया- कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है… अगर तुम साढ़े दस बजे सो जाती हो, तो तुम्हारे व्हाॅट्सएप्प पर लास्ट सीन ढाई बजे रात क्यों दिखाता है? जोक पढ़कर मेरे दिमाग की बत्ती जल गयी. असल में नये-नये एप हमारी जिंदगी में किस तरह असर डाल रहे हैं, इसका अंदाजा हमें खुद नहीं है. एसएमएस में तो आप झूठ बोलकर निकल सकते थे कि मेसेज नहीं मिला. पर ये नये-नये चैटिंग एप, लास्ट सीन और ब्ल्यू टिक वाला स्टेटस आपकी सारी हकीकत खोल देते हैं.
यारी-दोस्ती करना अच्छी बात है, पर यारी-दोस्ती जब ज्यादा और गलत लोगों से हो जायेगी, तो आपको समस्या आयेगी ही. एक ओर मोबाइल क्रांति ने हमें ग्लोबली कनेक्टेड तो कर दिया ही है. वहीं कहीं हम नेट बैकवर्ड न घोषित कर दिये जायें, इस चक्कर में जितने चैटिंग एप इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, वे सब हमारे मोबाइल पर होने चाहिए.
इस ललक ने कब हमें इतना एक्सप्रेशनलेस कर दिया कि हम अपने रीयल एक्सप्रेशन को भूल टेक्निकल एक्सप्रेशन यानी इमोजी के गुलाम बन गये हैं. हंसी आये या ना आये, मगर ‘हा हा हा’ लिखकर कोई स्माइली बना दो, सामने वाला यही समझेगा कि आप बहुत खुश हैं. पर क्या आप वाकई खुश हैं?
अक्सर हम चैट पर यही कर रहे होते हैं. वर्चुअल चैटिंग में हम जीवन की असली समस्याओं का हल ढूंढने लग गये हैं.
हमारे फोनबुक में बहुत से लोगों के नंबर सेव रहते हैं और हम जितने ज्यादा चैटिंग एप डाउनलोड करेंगे, हम उतने ही ज्यादा खतरे में रहेंगे, क्योंकि कोई-न-कोई चैटिंग एप हर कूल डूड के मोबाइल में रहता है और इससे कोई भी, कभी भी आपको संदेशा भेज सकता है. यह जाने बगैर कि आप बात करने के मूड में हैं या नहीं. दूसरी चीज है आपकी प्राइवेसी, चैटिंग एप और कुछ न बतायें, तो भी ये तो सबको बता ही देते हैं कि आप किसी खास एप पर कितने एक्टिव हैं.
अगर इससे बचना है, तो कुछ और एप डाउनलोड कीजिये. यह तो आप भी मानेंगे कि बगैर काम की चैटिंग खाली लोगों का काम है या आप इमोशनली वीक हैं और रीयल लाइफ में आपके पास कोई नहीं है, जिससे आपकी उंगलियां मोबाइल के की पैड पर भटकती रहती हैं कि कहीं कोई मिल जाये?
ज्यादा चैटिंग बताती है कि आप फोकस्ड नहीं हैं और आपके पास कोई काम नहीं है. ये समय कुछ पाने का, कुछ कर दिखाने का है. बात जिंदगी की हो या रिश्तों की, हम जितने सेलेक्टिव रहेंगे, उतना ही सफल रहेंगे और यही बात एप और चैटिंग पर भी लागू होती है. जो आपके अपने हैं, उन्हें वर्चुअल एक्सप्रेशन नहीं, रीयल एक्सप्रेशन की जरूरत है.
इमोजी आंखों को अच्छी लगती है, पर जरूरी नहीं कि दिल को भी अच्छी लगे. जो रिश्ते दिल के होते हैं, उन्हें दिल से जोड़िए. नहीं तो एक वक्त ऐसा आयेगा, जब आप होंगे और आपकी तन्हाई होगी. आपके मोबाइल के फोनबुक में खूब नंबर भरे होंगे, लेकिन आपके दिल की गलियां सूनी होंगी.
