पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपने बड़बोले ही नहीं ऊटपटांग और अभद्र बयानों के लिए भी खासे बदनाम हैं. विशेषणों की इस सूची में आप अप्रत्याशित को भी जोड़ सकते हैं. दुनिया के लगभग सभी देश अब तक इसके आदी हो चुके हैं.
लेकिन, अभी कुछ दिन पहले उन्होंने चीन के विरुद्ध नये और कहीं अधिक कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की जो धौंस भरी धमकी दी है, वह भौंचक्का कर देनेवाली है. ऐसा लग रहा है कि उन्होंने अचानक फिर कलाबाजी खायी है, बिना इसके नतीजों का अनुमान लगाये, क्योंकि दो चार ही दिन पहले उन्होंने यह संकेत दिये थे कि चीन के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका अब सुलह की पेशकश कर सकता है. उच्च-स्तरीय चीनी प्रतिनिधिमंडल इस वार्ता के लिए निकलने की तैयारी पूरी कर चुका है.
ट्रंप के तेवर मुठभेड़ वाले हैं. उनका मानना है कि अब तक जो चीनी उत्पाद प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखे गये थे, उन्हें भी अविलंब 10 प्रतिशत से बढ़ा 25 प्रतिशत की दर वाले शुल्क के शिकंजे में कसा जायेगा और कोई भी उत्पाद दंड से अभयदान की अपेक्षा नहीं कर सकता. इस ऐलान का गंभीर असर चीनी शेयर बाजार पर पड़ा है, जिसके सूचकांक में 5.5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज हुई है. चीनी पत्र-पत्रिकाओं में ट्रंप को अमेरिकी कॉमिक्स के खलनायक के रूप में चित्रित किया जा रहा है. ट्रंप इस खतरे से बेखबर लगते हैं कि इन प्रतिबंधों का कितना बुरा प्रभाव अमेरिकी अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहा है.
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अमेरिका में एक व्यक्ति के लिए रोजगार पैदा करने की कीमत लगभग 8,15,000 डॉलर साबित हो रही है. फिलहाल चीन ने इस बात का कोई संकेत नहीं दिया है कि वह घुटने टेकने जा रहा है. इतना ही नहीं चीन ने अमेरिकी चेतावनी को अनसुना कर ईरान से तेल की खरीद में भी कोई कटौती नहीं की है. वह अपनी संप्रभुता का क्षय नहीं होने दे रहा है.
भारत में कुछ अदूरदर्शी विश्लेषक अमेरिका द्वारा चीन की घेराबंदी से हुलस रहे हैं, यह सोचकर कि जो काम भारत खुद करने में असमर्थ था- चीन पर अंकुश लगाने का- वह अमेरिका ने कर दिखाया है. हम स्वयं यह मानते हैं कि भारत का स्थायी बैर-भाव चीन से है पाकिस्तान से नहीं, पर इसके बावजूद हम इस घड़ी यह सुझाना चाहते हैं कि अमेरिका द्वारा इस तरह चीन का कद बौना करने की चेष्टा हमारे हित में नहीं. यदि ट्रंप चीन को बधिया करने में सफल होते हैं, तब भारत को खारिज करना उनके लिए और भी आसान हो जायेगा. वह पहले ही हमें ईरान से अपंग करने में कामयाबी हासिल कर चुके हैं.
हमने यह जतला दिया है कि हमारी रीढ़ कितनी लचीली है. यह अपेक्षा करना तर्कसंगत नहीं कि ईरान से तेल की खरीद में कटौती के बाद वह देश हमें चाबहार जैसी परियोजनाओं में सामरिक सहकार के अवसर सुलभ कराता रहेगा. ईरान की घेराबंदी के लिए अमेरिका ने एक जंगी जहाज इस क्षेत्र में पठाया है, जिसे भड़कानेवाली कार्यवाही ही कहा जा सकता है. इस संदर्भ में हमारा मौन चिंताजनक है.
हम इसी बात से मुदित मन हैं कि हमने मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय दहशतगर्द घोषित करवाने में कामयाबी हासिल कर ली है. बाकी दुनिया में जो भी घट रहा है, उसमें हमारी दिलचस्पी नजर नहीं आ रही. इस राजनयिक उपलब्धि की क्या कीमत हमने चुकायी है या निकट भविष्य में चुकानी पड़ेगी, उसका हिसाब लगाने की फुर्सत किसी को नहीं. कहा यह जा रहा है कि चीन की रजामंदी के लिए हमने ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना के बारे में अपनी आपत्ति मुखर न करने का आश्वासन दिया है.
अमेरिका में इस काम में अपनी दोस्ताना मदद की एवज में ईरानी तेल आयात की भरपाई सऊदी अरब तथा अमेरिका के तेल से करने का वचन दिया है. यह फैसले निश्चय ही हमारे राष्ट्र हित में नहीं. ट्रंप की नजर में अगर पहले नंबर पर चीन अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचानेवाला देश है, तो भारत इसके ठीक बाद दूसरे नंबर पर खड़ा है. अगला निशाना वही बनेगा.
इस बारे में शक की गुंजाइश नहीं कि जल्दी ही भारत को यह चेतावनी दी जाये कि यदि उसने चीन के साथ अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद आर्थिक व्यापार में कटौती नहीं की, तो उस पर भी कड़े प्रतिबंध लग सकते हैं.
कुछ अहंकारी अमेरिकी कंपनियों के हिंदुस्तान में आचरण से ऐसा लगता है कि वह अभी से खुद को सर्वशक्तिमान समझने लगी हैं. पेप्सी ने कुछ किसानों पर सैकड़ों करोड़ का मुकद्दमा दायर कर दिया इस आरोप के साथ कि उन्होंने इसकी बौद्धिक संपत्ति की चोरी की है. यहां इस विषय का विश्लेषण संभव नहीं पर यह याद दिलाने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय कानून तथा भारत द्वारा मान्य संधियों के अनुसार ऐसा दावा दायर नहीं किया जा सकता.
ट्रंप का दुस्साहस इसी कारण बढ़ा है कि वेनेजुएला तथा मेक्सिको में गैरकानूनी हस्तक्षेप की आलोचना करने की हिम्मत हमने नहीं दिखलायी है. हमारा क्लेश इस कारण है कि हम कोई छोटा देश नहीं, जो पारंपरिक रूप से अमेरिका का रक्षित बगलबच्चा रहा हो या उसका संधिमित्र. यदि हमने चीन की तरह प्रतिरोध का फैसला किया होता, तो चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा बाजार अमेरिका के हाथ से निकल जाता. उसको खुद वाणिज्य युद्ध की बड़ी कीमत चुकाने का दर्द महसूस होने लगता.
ऐसा जान पड़ता है कि चुनाव के वर्ष में हर मोर्चे पर कामयाबी का दावा करनेवाली सरकार अमेरिका को नाराज करने का जखिम नहीं उठाना चाहती थी. चिंताजनक बात यह है कि चुनावी नतीजे आने तक विकल्प नष्ट हो चुके होंगे. अमेरिका को रिझाने में मनमोहन सिंह मोदी से पीछे नहीं थे. एक बुश को गले लगाकर गदगद होता था, तो दूसरे के लिए ओबामा के साथ बेतकल्लुफ याराना मोहक था.
ट्रंप ने इसी का फायदा उठाया है. भारत ईरान से ही नहीं, फिलिस्तीन तथा रूस से भी दूर होता गया है. जापान और फ्रांस-जर्मनी या ऑस्ट्रेलिया आदि से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह अमेरिका का खिलाफ भारत के साथ खड़े हो सकते हैं.
हाल ही में हमारे पड़ोसी श्रीलंका में जो घटा है, उसे भारत ने अपने लिए खतरे की घंटी समझना चाहिए. अमेरिका की शह के कारण ही सऊदी वहाबी इस्लाम के विश्व व्यापी प्रसार का अभियान चला सका है. सऊदी तथा अमेरिकी तेल पर बढ़ी निर्भरता के बाद वैदेशिक ही नहीं, आंतरिक नीति-निर्धारण में भी भारत की संप्रभुता निरंतर संकटग्रस्त होती जायेगी. चीन या उत्तरी कोरिया की परेशानी हमारे लिए राहत नहीं, चेतावनी है.
