संविधान जहां मतदान का हक देता है, वहीं मतदान करना हमारा कर्तव्य भी है. लोगों को चुनाव के प्रति शिक्षित और जागरूक करने की सरकार की कोशिशों के बावजूद औसत नतीजे बेहतर नहीं हो पाये.
नुक्कड़ नाटक और स्कूली बच्चों के रोड शो भी वोटरों की उपस्थिति पर अनुकूल असर नहीं डाल पाये हैं. मगर खामियों से भरी सियासत ने बार-बार मतदाताओं को रायशुमारी से दूर रहने पर मजबूर किया है. इधर, इवीएम पर उठते सवालों ने भी चुनाव माहौल की आग में घी का काम किया है.
सियासत में नौजवानों की बढ़ती हिस्सेदारी के बावजूद मतदान औसत 60 से 70 फीसदी पर रुक जाना लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है. मतदान प्रोत्साहन की पहल के लिए सियासत सहित चुनावी तरीकों में काफी फेर-बदल की जरूरत है. चुनाव आयोग द्वारा ऑनलाइन मतदान की गुंजाइश तलाशना भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है.
एमके मिश्रा, रातू, रांची (झारखंड)
