पेंशन कर्मियों का मौलिक अधिकार

रोजगार का सृजन करना लोकतंत्र में किसी भी संवेदनशील सरकार की प्राथमिकता होती है. सरकार रोजगार खैरात में नहीं देती. इसके लिए योग्यता के मानकों पर व्यक्ति को खरा उतरना पड़ता है. तब कहीं जा कर नौकरी मिल पाती है. 25-30 वर्ष की उम्र में नौकरी मिलती है और एक कर्मी 60 वर्ष की आयु […]

रोजगार का सृजन करना लोकतंत्र में किसी भी संवेदनशील सरकार की प्राथमिकता होती है. सरकार रोजगार खैरात में नहीं देती. इसके लिए योग्यता के मानकों पर व्यक्ति को खरा उतरना पड़ता है. तब कहीं जा कर नौकरी मिल पाती है. 25-30 वर्ष की उम्र में नौकरी मिलती है और एक कर्मी 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त कर दिया जाता है. यह जीवन का सबसे कठिन दौर होता है.

ऐसी अवस्था में, जब वह सबसे असहाय होता है, जीवन के बचे समय को गुजारने के लिए आय का एकमात्र स्रोत पेंशन राशि होती है. उसे बंद कर देना क्या मानवीय मूल्यों का परिचायक है? कदापि नहीं. इसलिए शिक्षकों एवं अन्य कर्मियों की, जिनकी पेंशन 2004 से बंद कर दी गयी है, पुरानी पेंशन योजना को बहाल करते हुए उन्हें बुढ़ापे का सहारा देकर सरकार को अपने अच्छे कार्यों की सूची में एक सुनहरा अध्याय जोड़ना चाहिए.

देवेश कुमार देव, इसरी बाजार, गिरिडीह

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