सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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अपने हिस्से की समस्या खड़ी करने का अधिकार हर किसी को है. भला वह भी कोई इनसान है, जो समस्या तक खड़ी न कर सके. कीड़े-मकौड़े तक समस्या खड़ी कर देते हैं. इतना दम-खम तो हर किसी में होना चाहिए कि अपने या अपने से ऊपर के स्तर की समस्या खड़ी कर सके और आसपास के लोग परेशान होकर उसका लोहा मान लें.
हाल ही में मेरे एक पत्रकार मित्र अपने शहर के सबसे बड़े पुलिस अफसर के समस्या खड़ी करने के कौशल की तारीफ कर रहे थे. मित्र ने बताया कि शहर में नये कलेक्टर आये. उक्त पुलिस अफसर ने आते ही उनके सुरक्षा गार्ड हटा लिये.
चूंकि जिलाधिकारी को सुरक्षा गार्ड न देना एक असामान्य बात थी, अत: उसने राज्य सरकार के मुख्य सचिव को इसकी जानकारी दी. मुख्य सचिव के पूछने पर उक्त पुलिस अफसर ने जवाब दिया कि सुरक्षा गार्डों का बेहद अभाव है.
पुलिस अफसर शायद ठीक कह रहे थे, क्योंकि उनके अपने निवास पर केवल अठारह अर्दली ही तैनात थे. बाद में जब एक मंत्री ने उनसे पूछा, तो उन्होंने बताया कि कलेक्टर उनके घर नहीं आया था. यह वाकई बड़ी भारी हिमाकत थी.
किसी ने कलेक्टर से पूछ लिया, तो उन्होंने बताया कि वे तो अपनी तैनाती के दूसरे दिन ही बाकायदा समय लेकर तय समय पर पुलिस अफसर से मिलने गये थे, पर उन्होंने उन्हें चालीस मिनट तक बाहर बैठाये रखा. तंग आकर वे जाने लगे, तो पुलिस अफसर के सहायक ने अनुनय-विनय करके मुलाकात करवायी.
पुलिस अफसर के कमरे में घुसने पर कलेक्टर ने देखा कि वे अखबारी पन्नों के साथ मीटिंग में व्यस्त थे. कुछ मिनटों की मुलाकात के बाद कलेक्टर फिर पुलिस अफसर के पास नहीं गये, सो सुरक्षा गार्डों की कमी हो गयी. जरा इस पुलिस अफसर की समस्या-निर्माण-क्षमता पर गौर कीजिये. उसने चुटकी बजाकर अच्छी-खासी समस्या पैदा कर दी. इसे कहते हैं सक्षम पुलिस अधिकारी.
वह अधिकारी ही क्या, जो समस्या खड़ी न कर सके. ऐसे मंत्रियों को भी निकम्मा समझना चाहिए, जो समस्या खड़ी करने में असमर्थ हों. सांसद, विधायक, पार्षद, अफसर, क्लर्क, चपरासी, इंजीनियर, डॉक्टर, अध्यापक- मतलब यह कि सभी को समस्या खड़ी करने का जन्मसिद्ध अधिकार है और वे अपने अधिकार का बखूबी इस्तेमाल भी कर रहे हैं.
मेरे विचार से तो उनकी सफलता का आकलन भी इसी बात से होना चाहिए कि उन्होंने कितनी और किस तरह की समस्याएं खड़ी की हैं. सरकारों के काम का मूल्यांकन भी इसी आधार पर होना चाहिए कि उन्होंने जनता के लिए कितनी नयी समस्याएं खड़ी कीं.
समस्या खड़ी करना एक कला है. कहते हैं सर्वोत्तम नृत्य वह होता है, जिसमें नर्तक और नृत्य मिलकर एक हो जाते हैं. ऐसे ही समस्या खड़ी करने की कला भी तब अपने चरम पर होती है, जब समस्या और समस्या खड़ी करनेवाला मिलकर एक हो जाते हैं. परमानंद की-सी यह अवस्था तब आती है, जब समस्या खड़ी करनेवाला खुद एक बड़ी समस्या बन जाता है. ज्यादातर मामलों में नेता ही यह सिद्धि प्राप्त कर पाते हैं.
