कहने को तो झारखंड में हर नेता जनता के हित की सोचता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है. स्वार्थ की राजनीति ने नेताओं का असली चेहरा सामने ला दिया है. स्थानीयता जैसे संवेदनशील मुद्दे पर समय सीमा तय होने के बाद तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में मूल निवासियों को आरक्षण देना क्या स्वार्थ नहीं है? राज्य की 70 प्रतिशत आबादी ऐसी है जो मूल निवासी नहीं है.
क्या ये लोग प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी की नौकरी ले पायेंगे? 30 प्रतिशत मूल निवासियों में से 80 प्रतिशत आदिवासी हैं जिन्हें अनुसूचित जनजाति के तहत पहले से आरक्षण प्राप्त है. उन्हें अब और कितना चाहिए? 1932 की बंदोबस्ती या 1985 से झारखंड में रहने की बाध्यता मुख्य बिंदु नहीं है, बात सिर्फ आरक्षण की है जो साजिश के तहत गैर आदिवासियों से छीना जा रहा है. इस पर यहां के गैर आदिवासी नेता जनता से मुंह छिपा रहे हैं.
संजय कुमार, ई-मेल से
