पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में मुठभेड़ के दौरान तीन आतंकियों के साथ कम-से-कम सात प्रदर्शनकारी भी मारे गये. इन प्रदर्शनकारियों को आम नागरिक के रूप में परिभाषित करना वाकई मुश्किल है.
ये तो वे पत्थरबाज हैं, जो आतंकियों को बचाने के लिए सुरक्षाबलों पर पथराव करने के साथ ही उनके सुरक्षा घेरे को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे. वे आतंकियों से लोहा ले रहे जवानों के हथियार छीनने का भी दुस्साहस कर रहे थे. लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन के इस्तेमाल के बाद भी जब बात नहीं बनी, तब जाकर सुरक्षाबलों को गोली चलानी पड़ी.
यह किसी से छिपा नहीं है कि कश्मीर में पत्थरबाजी न केवल एक धंधा बन गयी है, बल्कि आतंकियों को बचाने का हिंसक तरीका भी. अत: इनकी मौत पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले मानवाधिकारवादियों को एक क्षण रुक कर राष्ट्रीय सुरक्षा के इस गंभीर प्रश्न पर भी विचार करना चाहिए.
चंदन कुमार, देवघर
