राजनीतिक पार्टियों को अपने संविधान और नियम बदलने चाहिए. इनमें सबसे पहले अवसरवादिता खत्म हो. दल से निष्कासित व्यक्ति के लिए दरवाजे कम-से-कम छह वर्ष के लिए बंद होने चाहिए.
अब तक होता यह है कि पार्टी से आज निकाला गया नेता कुछ ही समय बाद फिर से वफादार और उपयोगी हो जाता है. छह माह बाद आम चुनाव होने हैं, ये दृश्य फिर दोहराये जायेंगे. कुछ खुश, कुछ नाराज होंगे, इधर-से-उधर और उधर-से-इधर आयेंगे-जायेंगे. जाहिर है, यह सोच जब तक रहेगी, लोकतंत्र का मजाक बनता रहेगा.
लिहाजा संसद, विधानसभा, चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इस पर मंथन करना चाहिए और देश को इस सबसे बड़ी कुप्रथा से कैसे निजात मिले, यह तय करना चाहिए. अगर पार्टियां इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेती हैं तो जनता का अपना दबाव बनाना चाहिए, ताकि वे सुधार करने के लिए बाध्य हों.
डाॅ हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर.
