इंदिरा गांधी की मौत के बाद भड़के सिख दंगों के 34 साल गुजरने के बाद फैसला आया, वह भी आधा-अधूरा फैसला है. अंग्रेजी में एक कहावत है कि जस्टिस लेट इज जस्टिस डिनाइड यानी देर से दिया गये फैसले का मतलब फैसले से वंचित करना है.
अब इस फैसले को आने में इतनी देर लगी, उसे क्या समझा जाये? क्या इतनी देरी के पीछे भी राजनीति चल रही थी? जो आतुरता दूसरे मामले में दिखती है, वही आतुरता इसमें क्यों नहीं दिखी? हम सभी मानते हैं कि अपराधी का कोई धर्म नहीं होता है.
फिर किसी व्यक्ति विशेष द्वारा की गयी गलती की सजा पूरे समुदाय को क्यों भुगतना पड़े? ऐसा भी नहीं है कि और संप्रदायों के लोग अपराध नहीं करते, पर एक व्यक्ति द्वारा किये गये अपराध की सजा उसके पूरे संप्रदाय को नहीं दी जा सकती है, जैसा कि सिख दंगों में हुआ था? उस समय की सरकार की प्रशासनिक विफलता ने ही इसे इतने व्यापक ढंग से होने दिया था.
सीमा साही, बोकारो
