उच्चतम न्यायालय ने ‘प्रतिबंधित’ महिलाओं को सबरीमला की सीढियां लांघने की इजाजत दे कर इतिहास रचने की कोशिश की है, मगर हमने तो महिलाओं की ही नहीं, अय्यप्पा स्वामी की भी सीमाएं तय कर रखी हैं.
तभी तो हमारी मानसिक जड़ता ने उसको भी धता बता दिया. जिस न्यायालय के फैसले पर हमारा अटूट विश्वास है, जिस देश में महिला सशक्तीकरण की बात होती हो, वहां औरतों की सीमाबद्ध परिभाषा बेमानी लगती है. यह समाज जिसने नारी को अबला बना रखा है, परंपराओं के संकुचित घेरे से आगे कतई जाने नहीं देगा.
अय्यप्पा की ड्योढ़ी पर सुलगती आग को राजनीति की चिंगारी का साथ मिलना संभव है, क्योंकि सवाल सबरीमला से आगे का है. आस्था के प्रतीक राम मंदिर का निर्माण भी न्याय की उम्मीद में अदालत की चौखट पर खड़ा है. उधर, संदेह की सूई सबरीमला से उतरते रास्ते को अयोध्या की ओर मोड़ने के इशारे कर रही है.
एमके मिश्रा, रातू, रांची
