अमृतसर के भयावह हादसे ने रेल सुरक्षा की ओर देश का ध्यान फिर खींचा है. इस हादसे का पहला सबक तो यही है कि रेलगाड़ियों का परिचालन यात्रियों या फाटकों-पटरियों से गुजरते लोगों के लिए खतरे का सबब नहीं बनना चाहिए. ऐसे में जोर हिफाजती इंतजाम पर होना चाहिए. अफसोस है कि यह मसला लंबे अरसे से उपेक्षित है. पटरियों पर गाड़ियों की चपेट में आकर जान गंवानेवालों की बड़ी तादाद इसी का संकेत है.
इस साल के आंकड़े अभी नहीं आये हैं, पर भारतीय रेलवे के मुताबिक, 2015 से 2017 के बीच ऐसी दुर्घटनाओं में करीब 50 हजार लोगों की मौत हुई है. सघन आबादी वाली जगहों पर रेल पटरियों के आसपास आवागमन को नियंत्रित करने के लिए विशेष उपाय किये जाने चाहिए. साल 2013 में बिहार में पटरी पार कर रहा तीर्थयात्रियों का एक जत्था ट्रेन की चपेट में आ गया था. इस मसले को सिर्फ मानव-रहित रेलवे फाटक या लोगों की लापरवाही जैसी वजहों की आड़ लेकर टालना उचित नहीं है.
बेशक भारतीय रेलवे ने सघन आबादी वाले क्षेत्रों में रेलवे फाटक और उसके आस-पास सुरक्षा का बेहतर इंतजाम किया है, परंतु हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि ये इंतजाम पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं. स्टेशनों पर यात्रियों को जरूरी जानकारी देना, लोगों से पुलों के इस्तेमाल का आग्रह करना, पटरियों पर चलने या खड़े होने में लापरवाही या गलती की निगरानी करना या फिर पटरियों के इर्द-गिर्द बाड़ लगाना सामान्य उपाय हैं. इन्हें विशेष प्रयासों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है.
ऐसे उपाय भी सभी जगहों पर समान रूप से और कारगर तरीके से अमल में हों, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है. दूसरे, त्योहारों या धार्मिक यात्राओं के समय सड़कों और रेलमार्गों पर भीड़ ज्यादा होती है. ऐसे में भगदड़ की स्थितियां रोकने या वाहनों की चपेट में आने से लोगों को बचाने के लिए दुर्घटना की आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए तथा स्थानीय प्रशासन और संबद्ध विभागों की सहभागिता से सुरक्षा के पुख्ता उपाय होने चाहिए. कानून का डर बैठाने के लिए गश्त या धर-पकड़ से निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता है.
पटरियों को गैरकानूनी तरीके से पार करने के जुर्म में इस साल सितंबर तक 1.20 लाख लोगों को हिरासत में लिया गया था. यह संख्या पिछले साल 1.75 लाख थी. लेकिन, गिरफ्तारी या जुर्माना से हादसों को रोकने में सीमित सफलता ही मिली है. पटरी पर होनेवाले हादसों में वन्य जीवों और अन्य पशुओं की मौतें भी होती रहती हैं.
हालांकि रेल के परिचालन में तकनीक का समावेश तेजी से हो रहा है और अाधुनिकीकरण की प्रक्रिया भी चल रही है, पर सुरक्षा और निगरानी में अब भी दशकों पुरानी व्यवस्था ही कायम है.
यह आशा तो की ही जा सकती है कि रेल विभाग प्रबंधन की खामियों को दूर करने के साथ अपनी सुरक्षा नीति पर गंभीरता से विचार करेगा तथा मानव संसाधन और तकनीक के तालमेल से हादसों पर अंकुश लगाने की जुगत करेगा.
