मुजफ्फरपुर के एक बालिका गृह में छोटी बच्चियों से दुष्कर्म की घटना समाज की संवेदनहीनता और चारित्रिक पतन की हद है. उसपर राजनीति करना तो संवेदनहीनता और नैतिक पतन की पराकाष्ठा ही हैं. बालिका गृह में बच्चियां अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए लायी जाती हैं, पर जहां उनका वर्तमान ही सुरक्षित नहीं हो, वहां भविष्य कैसा होगा? ऊपर से सूचना क्रांति के इस युग में इस मामले के सामने नहीं आने से इसमें बड़े-बड़े लोगों की संलिप्तता का संदेह तो पैदा होता ही है.
शारीरिक शोषण से पीड़िता शायद उबर भी जाएं (हालांकि यह भी उनके लिए बहुत आसान नहीं होगा), पर भावनात्मक आघात तो जिंदगी भर भुगतना उसकी मजबूरी होगी. ऐसे मामलों में समाज को पूरी ताकत के साथ आगे आना ही होगा. तभी ऐसे तत्वों और उन्हें संरक्षण देने वालों पर दबाव बन सकेगा. साथ ही, हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हाल ही में संसद में पास हुए बिल से, जो बाल शोषण के मामलों की फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई की वकालत करता हैं, कोई हल निकल सकेगा.
सीमा साही, बोकारो
