यदि कांग्रेस का हाथ सही से जनता के साथ होता, तो आज उसकी ऐसी दयनीय हालत नहीं होती. राहुल गांधी की अध्यक्षता में पार्टी ने गुजरात और कर्नाटक में निश्चित ही अच्छा प्रदर्शन किया है और उपचुनाव में गठबंधन का भी अपना अच्छा प्रभाव रहा है.
अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में ज्वलंत मुद्दों पर सरकार की आलोचना और भाईचारे से उनका प्रधानमंत्री के गले लगना भी एक नया, ऐतिहासिक और सकारात्मक कदम हो सकता था, यदि दुर्भाग्य से आंख मारने वाली व आंखों-में-आंखें डालने वाली बात न होती. यह घटना पार्टी को बहुत भारी पड़ गयी लगती है. इसलिए अब पार्टी अपना हाथ दूसरी पार्टियों से मिलाने के लिए और अधिक बेताब लगती है. अब पार्टी को अपना हाथ कैसे आगे बढ़ाना है, इस पर बड़ी गंभीरता से सोचना होगा.
वेद मामूरपुर, नरेला
