।। डॉ भरत झुनझुनवाला।।
(अर्थशास्त्री)
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने को है. देश की जनता की प्रमुख मांग रोजगार की है. मोदी ने इस विषय को गंभीरता से लेने का आश्वासन दिया है, परंतु उनकी नीति इस उद्देश्य की पूर्ति में बाधक बन सकती है. मोदी के कॉरपोरेट जगत से मधुर संबंध हैं, जो उचित है. द्वितीय विश्व युद्घ के बाद जापान ने आर्थिक क्षेत्र में जो सफलता हासिल की है, उसके पीछे सरकार तथा कॉरपोरेट जगत के मिल कर चलने की नीति है. परंतु कॉरपोरेट जगत संवेदनहीन होता है. सरकार की जिम्मेवारी है कि कॉरपोरेट जगत को सही दिशा दे. अतएव मोदी को कॉरपोरेट जगत को सद्दिशा देनी होगी.
आज रोजगार देना कठिन है. चूंकि बड़ी कंपनियों द्वारा ऑटोमेटिक मशीनों से सस्ता माल बनाया जा रहा है. इन कारखानों में कम संख्या में ही रोजगार उत्पन्न होते हैं. जैसे किसी शहर में 10,000 गज कपड़े की प्रतिदिन की डिमांड है. पूर्व में इसे 1,000 जुलाहे बनाते थे. अब इतने ही कपड़े को टेक्सटाइल मिल के 10 कर्मचारी बुन देते हैं. उद्यमी द्वारा पूंजी का उपयोग अधिक और श्रम का उपयोग कम किया जा रहा है. पूंजी और श्रम के बीच घोर संघर्ष चल रहा है. समस्या वैश्वीकरण की है. दूसरे देशों में मशीन का अधिक उपयोग हो रहा है. वहां उत्पादन लागत कम आयेगी. वहां बने सस्ते कपड़े का आयात होगा, जैसे चीन में बने सस्ते कपड़े का आयात हो रहा है और जुलाहे द्वारा बुना गया महंगा कपड़ा बाजार से बाहर हो जायेगा. ऐसे में सरकार के सामने कठिन चुनौती है. रोजगार अथवा ऊंचे वेतन में से एक को चुनना होगा. रोजगार उत्पन्न करने के लिए वेतन में कटौती करनी होगी. परोक्ष रूप में सरकार ने वेतन में कटौती के रास्ते को चुना है. उद्यमी द्वारा आवश्यकतानुसार श्रमिकों को रखा अथवा निष्कासित किया जा सकेगा. ठेकेदार के माध्यम से श्रमिकों को रखा जा सकेगा. इन कदमों से वेतन में कटौती और तद्नुसार रोजगार में वृद्घि होगी, पर हमें चाहिए वेतन तथा रोजगार दोनों में वृद्घि.
विद्वानों द्वारा अक्सर कहा जाता है कि सुशासन, लालफीताशाही पर नियंत्रण, बुनियादी संरचना में निवेश, शिक्षा में सुधार एवं छोटे उद्यमों को टैक्स में छूट आदि से अर्थव्यवस्था में गति आयेगी और रोजगार उत्पन्न होंगे. यह सही है, लेकिन इससे बेरोजगारी की मूल समस्या का समाधान नहीं होगा. चूंकि मशीनी उत्पादन के बढ़ने से दूसरे क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिक भी बेरोजगार हो जायेंगे. जैसे सूमो के प्रचलन से घोड़ागाड़ी का धंधा बंद हो गया है. सूमो और घोड़ागाड़ी में इतना लंबा फासला है कि ये सब प्रयास सही दिशा में होते हुए भी निष्प्रभावी सिद्घ होंगे.
सूमो की स्थिति में सुधार किया जाये तो भी रोजगार पर सुप्रभाव पड़ना जरूरी नहीं है. टैक्सी का परमिट आसानी से मिल जाये, पक्की सड़क बन जाये, गन्तव्य स्थान पर पहुंचने के लिए जीपीआरएस लगा दिया जाये एवं आसान किस्त पर लोन उपलब्ध करा दिये जायें, तो भी विशेष अंतर नहीं पड़ेगा. 20 वर्ष पूर्व से तुलना करें तो इन सभी व्यवस्थाओं में सुधार हुआ है, परंतु सूमो मालिकों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है. कारण यह कि सूमो की सप्लाई अधिक और डिमांड कम है. मूल समस्या आधुनिक तकनीक की है. आज कम संख्या में श्रमिकों के द्वारा भारी मात्र में माल का उत्पादन किया जा रहा है. नयी तकनीकों के कारण श्रमिक अप्रासंगिक होता जा रहा है. समाज घटते रोजगार और बढ़ते उत्पादन के असंतुलन में उलझता जा रहा है. नयी सरकार को इस मूल समस्या को चिह्न्ति करके रोजगार बनाने की रणनीति बनानी चाहिए. सुशासन, बुनियादी संरचना में सुधार तथा स्किल डेवलपमेंट से निश्चित सुधार होगा, परंतु यह सतही बात है.
इसी प्रकार आधुनिक तकनीकों के दायरे में रह कर बुनियादी संरचना में सुधार तथा स्किल डेवलपमेंट से मूल समस्या हल नहीं होगी. नयी सरकार इन कदमों तक अपने को सीमित रखेगी, तो पहले एक दो वर्षो में सुधार दिखेगा. सुशासन आदि में सुधार के साथ-साथ नयी सरकार को उन चुनिंदा क्षेत्रों को चिह्न्ति करना चाहिए, जहां मशीनी उत्पादन पर न्यून टैक्स लगाने से बड़ी मात्र में श्रम-सघन उत्पादन शुरू हो सकता है. जैसे पेट्रोलियम रिफायनरी पर भारी टैक्स लगा दिये जायें, तो भी रोजगार उत्पन्न नहीं होंगे, परंतु मशीन से बुनाई, माचिस, मोमबत्ती, अगरबत्ती, कागज के डिब्बे बनाने आदि पर टैक्स लगा दिया जायें, तो उद्यमी के लिए इसका उत्पादन श्रमिक से करवाना लाभप्रद हो जायेगा, तभी हम बढ़ती जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध करा पायेंगे. इस पॉलिसी को लागू करने में ग्लोबलाइजेशन आड़े आयेगा. डब्ल्यूटीओ संधि के अंतर्गत हमने खुले बाजार को अपनाया है. अत: उपरोक्त रोजगारपरक पॉलिसी को हम अपने बल पर लागू नहीं कर सकते हैं. अपने जुलाहे को रोजगार देने को हमें अपनी कपड़ा मिलों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ चीन में बने सस्ते कपड़े के आयात पर भी प्रतिबंध लगाना होगा.
