नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार की राजनीति में एक बड़ा शून्य उभरा है. उनके इस्तीफे से सबका हतप्रभ रह जाना इस बात की मुखर घोषणा है. विरोधी हतप्रभ हैं, क्योंकि एक तो जदयू के टूटने की उनकी उम्मीदों के विपरीत विधायक दल ने दोबारा नीतीश को ही अपना नेता चुना. दूसरे, बिहार के हालिया राजनीतिक इतिहास में पहली बार किसी राजनेता ने साबित किया है कि वह कुर्सी से ज्यादा अपने सिद्धांतों को तरजीह देता है.
कार्यकर्ता रोष में हैं, क्योंकि वे अपने को नीतीश से एकाकार मानते हैं. प्रदेश की जनता सकते में है, क्योंकि नीतीश के रूप में उसने बिहार की राजनीति में संभवतया पहली बार एक ऐसे नेता को देखा, जिसने सपनों के हवामहल भर नहीं दिखाये, बल्कि अपने काम से कुछ वर्षो में ही प्रदेश की छवि बदल डाली. नीतीश के नेतृत्व में बिहारवासियों ने लंबे इंतजार के बाद महसूस किया कि शासन जनता की जरूरतों के प्रति जवाबदेह हो सकता है. जहां पहले प्रदेश की राजनीति अपहरण-उद्योग चलाने और सत्ता-तंत्र को परिवार-तंत्र में बदलने की वजहों से कुख्यात हो रही थी, वहीं नीतीश शासन चंद सालों में ही समाज के वंचित तबकों के सशक्तीकरण के साथ-साथ ऊंची विकास-गति के कारण पहचानी गयी. बिहार की छवि बदलने का करिश्मा नीतीश ने सत्ता पर अनंतकाल तक काबिज रहने की आकांक्षा से नहीं, बल्कि समाजवादी सिद्धांतों के अनुरूप सामाजिक-पुनर्रचना के भाव से किया.
अल्पसंख्यकों के बीच पसमांदा समाज और दलितों के बीच महादलित की कोटि रचकर दूरदर्शी नेता ने सामाजिक न्याय के मुहावरे से चल रही राजनीति की कमियों पर साहस के साथ अंगुली रखी. नीतीश ने देख लिया था कि बिहार में वंचित तबकों के उत्थान के लिए चलनेवाली सामाजिक न्याय की राजनीति एक सीमा तक पहुंच कर ठहर गयी है. उन्होंने विकास में वंचित तबके की भागीदारी के सिद्धांत पर चलकर सामाजिक न्याय का विस्तार अधिकतम वंचित समुदायों तक करने की कोशिश की. इस्तीफे के बाद नीतीश के शासन को बिहार को विकास के रास्ते पर ले जाने के साथ-साथ विकास में वंचित तबके की भागीदारी के सवाल को विस्तार देने और शासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए भी याद रखा जायेगा.
