।। चंदन श्रीवास्तव।।
(एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस)
चुनावी नतीजों के अगले दिन कुछ अखबारों ने बीजेपी को मिले जनादेश के लिए ठीक ही ‘सुनामी’ शब्द का प्रयोग किया. बीजेपी की जीत के लिए ‘लहर’ शब्द नाकाफी है. ‘लहर’ पहले से मौजूद बनावटों को मिटाने के बावजूद उनके कुछ अवशेष छोड़ जाया करती है, लेकिन ‘सुनामी’ का आना संपूर्ण ध्वंस की सूचना है. फिलहाल यही लग रहा है कि कम-से-कम उत्तर भारत के दो महत्वपूर्ण राज्यों- बिहार और यूपी- में बीजेपी की अप्रत्याशित जीत क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व और विचारधारात्मक आधार के लिए तात्कालिक तौर पर ध्वंस की सूचना है. हालांकि तमिलनाडु, प. बंगाल, ओड़िशा और एक हद तक आंध्र के नतीजे विश्वासपूर्वक ऐसा कहने से अभी रोकते हैं.
उत्तर प्रदेश और बिहार में बीजेपी की जीत का आकार और उसका दूरगामी प्रभाव सचमुच अचंभित करता है. बिहार में बीजेपी 20 से ज्यादा सीटें जीत सकती है, इसका अनुमान तो कई सर्वेक्षणों में किया गया था, लेकिन यूपी में उसे 70 से ज्यादा सीटें हासिल होंगी, इसकी भनक खुद इस हैरतअंगेज जीत के सूत्रधार अमित शाह को भी नहीं थी. देशभर से बीजेपी को जितनी सीटें (282) हासिल हुईं, उसका एक चौथाई हिस्सा (71) अकेले यूपी से आया है. यह उत्तर प्रदेश में बीजेपी के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (1998 में अविभाजित उत्तर प्रदेश की 85 में से 57 सीटें) से तकरीबन एक तिहाई ज्यादा है और ठीक ही अचंभित करता है, खासकर यह देखते हुए कि बीजेपी ने अपनी जीत के लिए चुनाव-प्रचार से पहले यूपी समेत पूरे देश में सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ वैसा कोई जनांदोलन नहीं चलाया था, जैसा कि कभी केंद्र से कांग्रेसी वर्चस्व तोड़ने के लिए जेपी या फिर वीपी सिंह के दौर में देखने को मिला था. कहा जा सकता है कि बीजेपी को केंद्र में किसी जमाने की कांग्रेस की तरह मजबूत सत्ताधारी पार्टी बनाने का जनादेश इस बार यूपी से आया और वह भी बगैर किसी आंदोलन के, तो झूठ ना होगा.
बगैर सघन आंदोलन चलाये अगर कोई पार्टी सीटों को बटोरने के मामले में सुनामी सरीखा जोर दिखा सकती है, तो क्या यह मान लिया जाये कि चुनावी रणनीति के तौर पर ‘एक चेहरा-एक संदेश’ का जादू यूपी और बिहार में कुछ ज्यादा ही चला और अर्थव्यवस्था के चालू मुहावरे में ‘डेवलपमेंट डेफसिट’ राज्यों में शुमार इन राज्यों के मतदाताओं को मोदी में विकास-पुरुष का साकार अवतार दिखा? दूसरे शब्दों में, क्या यह मान लिया जाये कि लोगों ने यूपी-बिहार में जाति-धर्म के परंपरागत खांचों से ऊपर उठ कर विकास की आकांक्षा से वोट डाले और अपने सघन प्रचार-अभियान के बूते बीजेपी ‘विकास’ के जुमले को मतदाताओं के मन में बैठाने में कामयाब रही? यूपी का जनादेश तो यही संदेश देता लगता है, लेकिन जरा गहराई में उतरें तो यह निष्कर्ष खोटा साबित होता है. इस जनादेश के बारे में सिर्फ यह कहकर काम नहीं चलाया जा सकता कि कमजोर नेतृत्वक्षमता वाली कांग्रेस विकास के नाम पर चहुंमुखी भ्रष्टाचार में लिप्त थी, इसलिए कांग्रेस के प्रति लोगों का रोष बीजेपी के पक्ष में वोट डाल कर प्रकट हुआ. यह व्याख्या गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के विध्वंस की व्याख्या में भले ठीक हो, लेकिन यूपी-बिहार के संदर्भ में नहीं.
इसकी वजह है- बीते 25 वर्षो में यूपी-बिहार में विकसित हुई राजनीतिक-संस्कृति. यह राजनीतिक-संस्कृति विकास में सामाजिक वर्गो की हिस्सेदारी के सवाल पर विकसित हुई है. सिद्धांत के धरातल पर देखें, तो उत्तर भारत के शेष राज्यों की तुलना में यह राजनीति कहीं ज्यादा प्रगतिशील है, क्योंकि संसाधनों के बंटवारे में पिछड़े और वंचित सामाजिक वर्गो की बराबरी के सवाल को इस राजनीति ने एक हद तक जीवित रखा है. अपने वक्त में कांग्रेस के पराभव की जमीन नये सिरे से तैयार करते हुए सामाजिक न्याय की इस राजनीति की बुनियाद स्वर्गीय वीपी सिंह ने रखी थी. 15 अगस्त, 1990 का वीपी सिंह का भाषण इस राजनीति का एक तरह से मेनीफेस्टो था. उन्होंने कहा था कि समाज के वंचित तबके का उत्थान महज धन के बूते नहीं हो सकता. वंचित तबके का उत्थान तभी हो सकता है, जब सत्ता में उन्हें हिस्सेदारी मिले और हम उन्हें यह हिस्सेदारी देने के लिए तैयार हों. इसी आधार पर वीपी सिंह ने तब सरकारी नौकरियों में समाज के वंचित तबके के सदस्यों को आरक्षण देने को औचित्यपूर्ण ठहराते हुए कहा था कि नौकरशाही सत्ता-संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने की वजह से फैसला लेने के मामले में एक निर्णायक भूमिका निभाती है और हम देश की सत्ता-संरचना में शोषित-वंचित तबके को कारगर भूमिका देना चाहते हैं. सामाजिक न्याय की इसी भावना से संचालित राजनीति ने राजद, जदयू, सपा और बसपा सरीखे दलों और पिछड़े तबके को राजनीति के केंद्र में स्थापित किया.
यूपी-बिहार में पैदा सामाजिक बराबरी की इस राजनीति की अपनी दिक्कतें हैं- परिवार केंद्रित होना और संसाधनों में बराबरी की राजनीति के फायदे का विस्तार वंचित जाति-समूह तक न होना आदि. बहरहाल, बराबरी की राजनीति के बारे में एक बात बेखटके कही जा सकती है. केंद्र में सरकार बनाने की दावेदारी वाली पार्टियों- कांग्रेस और बीजेपी- ने हमेशा इसे संकीर्ण हितों की राजनीति कह कर प्रचारित किया है. सपा, बसपा, राजद, जदयू जैसे सामाजिक न्याय की भावना पर विकसित दल या फिर प्रादेशिक अस्मिता और स्वायत्ता के आधार पर केंद्रीय राजनीति में हिस्से की मांग करनेवाली तृणमूल, एआइडीएमके और टीडीपी जैसे दलों को बीजेपी-कांग्रेस ने स्थायी सरकार की राह में बाधा कहकर प्रचारित किया, जबकि शक्ति के मामले में केंद्र-राज्य के बीच मौजूद असंतुलन को दूर करने के लिहाज से क्षेत्रीय दलों की यह गठबंधनधर्मी राजनीति एक ऐतिहासिक जरूरत को पूरा करनेवाली साबित हो रही थी.
यूपी-बिहार के चुनाव-परिणाम इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि वंचित तबकों की राजनीति को मात देने के लिए बीजेपी ने हिंदू बहुसंख्यकवाद की भावना को संघनित करने में एक हद तक सफलता पायी. यह बात नीतीश कुमार और मायावती भी कह रही हैं. मुरादाबाद या फिर रामपुर संसदीय क्षेत्र, जहां मुसलिम आबादी 40 प्रतिशत से भी ज्यादा है, से बीजेपी के उम्मीदवारों (अगड़ों) का भारी मतों के अंतर से जीतना इस आशंका की शुरुआती तौर पर पुष्ट करता है.
अब क्षेत्रीय दलों के विचाराधारात्मक आधार में सेंध लगानेवाली इस नयी राजनीति की काट में क्षेत्रीय दलों को नये सिरे से मुहावरे गढ़ने और संघर्ष के साथी तलाशने होंगे. उम्मीद की जानी चाहिए कि नीतीश कुमार का इस्तीफा इस तलाश की शुरुआत साबित होगा.
